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1. बाल कहानी-मणि

story by monica guptaबाल कहानी -मणि

मणि छ्ठी क्लास में पढने वाली बेहद चुलबुली और शरारती लडकी है. वो भी बडे होकर कुछ बनना चाह्ती है. कभी सोचती है पत्रकार बन जाऊ कभी सोच में आता है कि टीचर बन जाऊ तो कभी पुलिस अधिकारी पर आखिर में क्या होता है और क्या बनने की सोचती है … इसी का ताना बाना है कहानी मणि में …

ये कहानी नेशनल बुक ट्रस्ट की पत्रिका पाठक मंच बुलेटिन में प्रकाशित हुई थी …

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2. हमारी मानसिकता

 

हमारी मानसिकता lady photo

हमारी मानसिकता-  कुछ देर पहले मैं अपनी सहेली मणि से मिलने गई. उससे मिलने कोई आई हुई थी. मुझे देखते ही उठने को हुई और बोली … ठीक है मैं शाम को आ जाऊंगी… और स्माईल देती हुई चली गई. उसके जाने के बाद मणि ने बताया कि ये महिला उनकी जानकार है और वो टी सैट  और दो चार चीजें मांगने आई थी कल के लिए चाहिए. असल में,  उनकी लडकी को लडके वाले देखने आ रहे हैं .. सामान अच्छा हो तो जरा रौब अच्छा पडता है.

मै सोचने लगी कि हमारी मानसिकता आज भी जस की तस है. लडकी पसंद करनी है या टीसैट पसंद करना है.   दिखावे के पीछे पागल से हुए पडे हैं. अपनी चादर बिना देखे दूसरों की चादर देख कर पांव पसराते हैं और अंत क्या होता है हम सभी जानते हैं  अब तो अखबार के सुर्खियां भी नही बनती कि दहेज के कारण मौत हुई.

फलां की शादी में 5 करोड लगे डिमकाना की शादी मॆं बारह करोड लगे. अरे छोडों हमें क्या लेना… बस जरुरत इस बात की है पहले दिन से ही कोई दिखावा न हो और सारी बात साफ और स्पष्ट हो ताकि सब कुशल मंगल रहे.

शादियों में बहुत खर्चा बेवजह होता है इस पर रोक लगा कर बच्चों के नाम ऎफ.डी करवा देंगें तो बहुत अच्छा होगा. बाकि हम चाहे 5 लाख दे या पांच करोड लोगों ने तो बोलना ही बोलना है … फिर किस के लिए दिखावा और क्यों ???

बहुत बडा प्रश्नवाचक है ????

 

 

story on marriage

फेरे हो रहे थे। दूल्हे मियां शराब में टुन्‍न थे। इतने कि वे लड़खड़ा रहे थे। आधे फेरे होते न होते टपकने को हुए कि दुल्हन ने शादी से ही इंकार कर दिया। ठीक भी है, ‘जब तक पूरे न हो फेरे सात, दुल्हन नहीं दुलहा की।’ इसी तरह एक शादी में दूल्हे के पिए हुए दोस्त दुल्हन पक्ष की महिलाओं के साथ बेहूदा मजाक कर रहे थे। जब उनकी मजाक अश्लीलता की हद तक पहुंच गई फिर भी दूल्हे ने हस्तक्षेप नहीं किया, अपने दोस्तों को मना नहीं किया तो इस दुल्हन ने भी बीच फेरे के डोर काट दी।

उल्लेखनीय बात यह है कि यह गुना जिले के बिजानीपुरा गांव की आदिवासी लड़की है। इसी तरह एक दूल्हे ने अपनी शिक्षा के बारे में झूठ बोला था। शादी के समय एक मौके पर साध्ाारण से गणित में वह ऐसा गड़बड़ाया कि उसकी पोल खुल गई और दुल्हन ने शादी से इंकार कर दिया। फेरे पर बैठकर दहेज में वस्तुओं की मांग करने वाले दूल्हों को दुल्हन द्वारा लौटाने की घटनाए भी पिछले कुछ सालों में हुई हैं।

सवाल यह है कि दूल्हे शादी के मंडप में बैठकर ही दहेज की मांग क्यों करते आए हैं? वजह यह कि अब तक लड़कियों के घरवाले इस बात से डरते आए हैं कि बारात लौट गई तो लड़की ‘लग्नभ्रष्ट’ हो जाएगी, फिर उससे शादी कौन करेगा? दूल्हे, दूल्हे के घरवालों और बारातियों का अहंकार तो हमारे समाज में ऐसा रहा है कि किसी बाराती की कोई मांग पूरी न हो या तथाकथित रूप से अपमान हो जाए तो दुल्हन को रोता छोड़ बारातें लौट जाती रही हैं।

दूल्हे के पांवों में दुल्हन के पिता द्वारा अपनी टोपी या पगड़ी रख देना, कर्ज लेकर वरपक्ष की मनचाही सामग्री जुटाना, दूल्हे के घर वालों की मिन्नातें करना कि कहीं बारात न लौट जाए, यह लड़की के बाप की नियति रही है। क्योंकि पहले लग्नभ्रष्ट हो जाने पर दुल्हन की कहीं शादी नहीं होती थी और दूल्हे को तो फिर कोई रिश्ता मिल जाता था। समाज की मानसिकता ऐसी थी कि कलंक सिर्फ दुल्हन को ही लगता था। बगैर पढ़ी-लिखी, परनिर्भर लड़कियों के हाथ में था भी क्या? लेकिन अब जमाने ने करवट ली है।

लड़कियां अब करारा जवाब देती हैं तो समाज में भी ऐसे बहुत से लोग निकल आते हैं जो लड़कियों को उद्दण्ड या लाजरहित बताने के बजाए उनके साहस की प्रशंसा करते हैं। मीडिया में भी ऐसे साहस की चर्चा होती है। अधिक से अधिक लड़कियां भी अब अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं।

ग्रामीण इलाकों तक ये जाग्रति पहुंची है कि जिस ससुराल में टॉयलेट न हो वहां जाने से दुल्हन इंकार कर दे। और एक दुल्हन इंकार करे तो उसकी खबर प्रेरणा बनकर अन्य युवतियों तक पहुंचे और एक सिलसिला बन जाए। ऐसा सकारात्मक साहस अधिक से अधिक युवतियों में होना चाहिए कि वे गलत बात बर्दाश्त न करें और समाज को उनका साथ देना चाहिए। See more…

हमारी मानसिकता

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3. बाल कहानी- सबक

बाल कहानी- सबक

monica gupta sabak

लोटपोट में प्रकाशित बाल कहानी- सबक

सबक मनु का आज चौथी कक्षा का नतीजा निकला। उसे प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। घर पर तथा विधालय में उसे खूब शाबाशी मिली। पर मनु को पता था कि उसके प्रथम आने के पीछे, उसकी मम्मी की सबसे ज्यादा मेहनत रही। जिसे वो पहले कभी नहीं समझ पाया था लेकिन एक दिन जो उसे सबक मिला वह शायद उसे कभी भुला नहीं पाएगा।

अपना रिपोर्ट कार्ड देखते-देखते, वह अतीत में खो गया बात पिछले साल से शुरू हुर्इ थी, लेकिन लगता है मानों कल की ही बात हो। बात तीसरी कक्षा की थी। इकलौता और नासमझ मनु बहुत ही शरारती था। उसके पापा दिन रात काम में लगे रहते। मम्मी घर का ख्याल रखती और मनु का भी बेहद ख्याल रखती। चाहे वो कितना भी जरूरी काम कर रही होती लेकिन मनु की आवाज सुनते ही वो सारा काम छोड़ कर आ जाती। मनु पर, ज्यादा ध्यान देने के कारण उन्हें मनु के पापा भी कितनी बार डांट देते कि तुम बिगाड़ रही हो। देखो, कितना मुंह फट होता जा रहा है, लेकिन मम्मी की तो मानो मनु जान ही था। हां, लेकिन एक बात अवश्य थी कि वो मनु की पढ़ार्इ पर जोर देती थी।

मनु चाहता था कि जैसे और बच्चों ने टयूशन रखी है उसकी भी रख दो। लेकिन ना जाने वो टयूशन के बहुत खिलाफ थी। वो अक्सर मनु को पढ़ाती-पढ़ाती खुद तो विधार्थी बन जाती और मनु शिक्षक। मनु एक-एक बात मम्मी को समझाता। इससे दोनों का फायदा होता। मनु को पाठ पूरी तरह से समझ आ जाता था। मम्मी तब हंस कर कहती कि अगर तुम्हारे जैसा शिक्षक मुझे मेरे बचपन में मिला होता तो मैं भी हमेशा अच्छे नम्बर लेती। मनु को अपनी मम्मी के अनुभव सुनने में रूचि होती। मम्मी बताती कि अपने स्कूल टार्इम में तो वह बहुत नालायक थी और हमेशा पोर्इंट पर ही पास होती। और जब रिपोर्ट सार्इन करवानी होती तो ना जाने कितने तरले और खुशामद वह अपनी मम्मी की करती। हिसाब में सवाल समझाने के लिए तो मनु को बहुत ही मेहनत करनी पड़ती क्योंकि उसकी मम्मी को सवाल समझ ही नहीं आता था।

अक्सर मनु के पापा घर पर स्कूल का खेल देखकर मुस्कुरा कर ही रह जाते। धीरे-धीरे मनु की पढ़ार्इ में सुधार होना शुरू हुआ। वह अक्सर अपने दोस्तों को अपनी मम्मी की पढ़ार्इ के बारे में बताता और कर्इ बार तो मजाक भी उड़ाने लगा। मम्मी आप तो बिल्कुल ही नालायक हो, पता नहीं स्कूल जाकर क्या करती थी। पर मम्मी सिर्फ मुस्कुरा कर रह जाती और बोलती, मैंने तो अपने सारे साल व्यर्थ ही गवाएं पर तुम तो अव्वल आओ।

पहले जब मनु के क्लास टेस्ट में कम नम्बर आते तो वह अपनी मम्मी को ही दोष देता। कम तो आऐंगें ही, नालायक मम्मी का बेटा भी नालायक ही होगा। पर सहनशीलता की मूर्ति मम्मी चुपचाप हल्की सी मुस्कुराहट देकर काम में लग जाती। एक बार तो मनु का दोस्त स्कूल से घर आया तो उस दिन हुए क्लास टैस्ट के नम्बर मम्मी ने दोनों से पूछे तो दोनों ने मजाक उड़ाते हुए कहा, Þ आप से तो अच्छे ही आए हैं। कम से कम हम पास तो हो गए। ß समय बीतता रहा।

मनु की पढ़ार्इ में फर्क आने लगा। लेकिन मम्मी का मजाक बहुत उड़ाने लगा। एक दिन मनु के सिर में बहुत दर्द उठा तो मैड़म ने उसे आयाजी के साथ घर भिजवा दिया। पापा दफ्तर जा चुके थे। मम्मी अलमारी की सफार्इ कर रही थी। सारा सामान फैला पड़ा था। मम्मी ने उसे दवार्इ देकर आंखे बंद करके लेटने को कहा और चुपचाप उसका सिर सहलाने लगी।

तभी पड़ोस की आंटी ने आवाज दी और मम्मी बाहर उठ कर चली गर्इ। मनु ने चुपचाप करवट बदली तो देखा एक लिफाफे से कुछ तस्वीरें बाहर झांक रही हैं। वह उत्सुकतावश उठा तो उन तस्वीरों को देखने लगा। तस्वीरों के नीचे एक लिफाफा और बंधा हुआ था, तस्वीरें देखते-देखते उसकी हैरानी की सीमा ही ना रही। वह सभी तस्वीरें उसकी मम्मी की बचपन की र्इनाम लेते हुए थी और जब उसने दूसरा लिफाफा खोला तो उसमे उसकी मम्मी की सारी रिपोर्ट कार्ड थी। वह हैरान रह गया कि वह हर विषय में पूरी क्लास में हमेशा प्रथम आती रही। तो क्या सिर्फ मनु को पढ़ाने के लिए, अच्छे अंक लेने के लिए उन्होंने यह झूठ बोला। मनु सोचने लगा कि उसने अपनी मम्मी को क्या-क्या नहीं कहा। उसे बहुत ही शर्म आ रही थी।

मम्मी के कदमों की आहट सुनते ही उसने तुरन्त सब फोटो और कागज थैली में ड़ाल दिए और सोने का उपक्रम करने लगा। मम्मी उसके तकिए के सिरहाने बैठ कर उसका माथा दबाने लगी। किन्तु, इस बार मनु अपना रोना रोक नहीं पाया और वह मम्मी से लिपट कर रोने लगा। मम्मी ने सोचा कि शायद इसके बहुत दर्द है। वह, डाक्टर को फोन करने के लिए उठने लगी पर, मनु ने मना कर दिया।

मम्मी लिफाफे से झांकती तस्वीरें देख कर समझ गर्इ थी। वह मनु की पीठ थपथपाने लगी और बोली कि अपने बच्चों को उन्नति के पथ पर बढ़ाने के लिए ऐसे छोटे-छोटे झूठ तो बोलने ही पड़ते हैं। पर उस दिन मनु ने मन ही मन कसम ले ली थी कि, वह भी अपनी मम्मी की तरह ही प्रथम आया करेगा और आज वही रिपोर्ट उसके हाथ में थी। और वह करवट बदल कर सो गया।

बाल कहानी- सबक

कैसी लगी आपको ये कहानी … जरुर बताना :)

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4. बाल कहानी- नानी मां

बाल कहानी- नानी मां

नानी के घर से मैं अपना सारा सामान समेट रही हूं। मैं आज पापा-मम्मी के साथ दिल्ली लौट रही हूं। अरे ∙∙∙! मैंने अपना परिचय तो दिया ही नहीं………। मैं हूं मणि। मेरा आठ साल पहले मसूरी के स्कूल में दाखिला हो गया था। नानी के मसूरी में रहने के कारण मैं छात्रावास में नहीं रही। अब मेरी दसवीं कक्षा की पढ़ार्इ खत्म हो गर्इ है और उससे भी बड़ी बात यह है कि नानी भी हमेशा के लिए अपने छोटे बेटे यानि मेरे मामा के पास अमरीका रहने के लिए जा रही हैं, विदेश जाने का उनका एक ही कारण है, वह है अकेलापन। वैसे वो भारत भी आएंगी, लेकिन कब……. इसका पता नहीं।
नानी पहले ही दिल्ली जा चुकी थीं। मैं मम्मी-पापा के साथ अपना सामान समेट रही हूं। चुपचाप आंसू भी छिपाने की कोशिश में हूं। मैं लगभग आठ साल से नानी के साथ रह रही हूं। मुझे वो इतनी…….इतनी प्यारी लगती हैं कि मैं सोच भी नहीं पा रहीं हूं कि मैं उनके बिना कैसे रहूंगी। इस बडे़ से घर के कमरे-कमरे में मेरी यादें बसी हैं। रजार्इ में बैठे-बैठे नानी का भीगे बादाम खिलाना, खांसी होने पर अदरक-शहद चटवाना और हर रविवार को इलायची चाय पिलाना।
सच, मेरी नानी हर काम में एकदम होशियार थीं। मम्मी भी बहुत अच्छी हैं, लेकिन जब से उन्होंने पापा के साथ व्यापार में हाथ बंटाना शुरू किया है, तब से वह बदल सी गर्इ हैं। सच पूछो तो मुझे छात्रावास भेजने का भी यही कारण रहा होगा ताकि वे बिना रूकावट व्यापार कर सकें। वो तो मैं नानी की वजह से आठ साल मजे से निकाल गर्इ। लेकिन अब मेरा दिल्ली जाने को बिल्कुल मन नहीं है।
बाहर पापा जल्दी करो की आवाज लगा रहे थे। उधर मम्मी मुख्य द्वार पर ताला लगा ही रही थीं कि मैंने प्यास का झूठा बहाना बनाया और रसोर्इ में भागी। असल में, मैं अपने आंसू मम्मी-पापा को दिखाना नहीं चाह रही थी। पानी पीते-पीते मैं रसोर्इघर की दीवारें, बर्तन सभी ध्यान से देख रही थी। नानी ने बोल दिया था कि मैं भारत लौट के नहीं आ पाऊंगी तो यह घर मेरी बेटी और उसके पति के हवाले है, चाहे वो इसे रखें या बेचें। उन्होंने सारे कागज मम्मी को थमा दिए थे। पापा, मम्मी की तो योजना बननी और उस पर लड़ार्इ होनी शुरू हो गर्इ थी। मकान बेचने में दोनों को बहुत फायदा दिख रहा था।
अचानक मम्मी की आवाज सुनकर मैंने अपने पर्स में जल्दी से कुछ रखा और बाहर आ गर्इ। पापा गुस्सा कर रहे थे कि यहां से देर से चलेंगे तो दिल्ली देर से पहुंचेंगे और अगर हम समय से नहीं पहुंचे तो नानी की फ्लाइट गर्इ तो हमें उन्हें बिना मिले ही वापस आना पड़ेगा। नानी से मिलने के शौक में मैं जल्दी से कार में बैठ गर्इ और मम्मी भी ताला लगाकर कार में बैठ गर्इ। मसूरी की गोल-गोल बनी सड़कों से गाड़ी नीचे उतर रही थी। मेरा दिल बैठा जा रहा था। बार-बार मैं अपने पर्स में झांक लेती। पर्स अपनी गोदी में ही रखा था और मैं उसे सहला रही थी। उधर, मम्मी-पापा की बहस जारी थी। पापा चाह रहे थे कि घर की लिपार्इ-पुतार्इ करके ही घर बेचा जाए, जबकि मम्मी कह रही थी कि जैसे है वैसा ही बेच देते हैं क्योंकि लिपार्इ…. आदि करवाने में खर्चा बहुत आएगा। खर्चा क्यों करें। सच, पैसा कितना दिमाग घुमा देता है, मैं आज देख रही थी। मुझे याद है कि नानी किस तरह घर का ख्याल रखती। पुराने समय का पत्थर, लकड़ी से बना इतना सुन्दर घर था कि लोग घर के सामने खड़े होकर तस्वीरें खिंचवाते थे।
नानी खुद भी बहुत हंसमुख व मिलनसार थीं। मेरी मम्मी…… बिल्कुल अलग थीं। नानी पुराने सामान को कितना सहेज कर रखती थीं। खासकर मेज, कुर्सी, रसोर्इ के पुराने बर्तन। तभी गाड़ी के ब्रेक लगे और मैं अतीत की यादों से निकल कर धरातल पर लौट आर्इ।
मैंने पुन: पर्स खोला, उसमें देखा और फिर उसे सहलाने लगी। मम्मी को कुछ शक-सा हो चला था।
उन्होंने पापा को कुछ इशारे से बताया, फिर मेरे हाथ से पर्स लेते हुर्इ मम्मी बोली, चलो, तुम सो जाओ, थक गर्इ हो। लेकिन वो पर्स मैंने उनके हाथों से खींच लिया। मम्मी भी गुस्से में आ गर्इं। मैं इतनी देर से देख रही हूं तू पर्स में बार-बार क्या देखे जा रही है। ला, दिखा तो सही, इसी छीना-झपटी में पर्स हाथों से खुल कर छूट गया। मम्मी जल्दी-जल्दी देखने लगी कि आखिर है क्या इस पर्स में……..। आखिर मैं ऐसी क्या अनमोल वस्तु लेकर जा रही हूं अपने पर्स में……। पापा गाड़ी चलाते-चलाते पूछ रहे थे कुछ मिला, मम्मी टटोल रही थी……. अचानक मम्मी का हाथ किसी से टकराया उन्होंने उसे बाहर निकाला  ये क्या….. चम्मच, तू चम्मच ले जा रही थी। पापा हंसने लगे।

मेरी आंखों में आंसू डबडबा आए। मां, आपको चम्मच देखकर कुछ याद नहीं आता, अपनी मम्मी का प्यार, दुलार। यह वही चम्मच है जब नानी आपको खाना देने में जरा भी देर करतीं तो आप इसी चम्मच को मेज से ठक-ठक करके कितना शोर मचाती थीं। इस चम्मच से ही मम्मी की प्लेट से राजमा उठाती थीं। मां हैरान-सी बोली,  लेकिन तुझे यह सब किसने…..? नानी ने, और किसने बताया। हम हर समय आपके बचपन की ही तो बातें करते रहते थे।
मां एकदम चुप हो गर्इ थीं। मेरा गला भी नानी का नाम लेते ही रूंध गया था। मां, नानी बहुत दूर जा रही हैं, पता नहीं, फिर कभी मिलने आए या ना…..यह चम्मच मैं नानी का हाथ समझकर ले रही हूं। इस चम्मच से अगर मैं खाना खाऊंगी तो समझूंगी कि नानी खाना खिला रही हैं। मां……..मुझे नानी की बहुत याद आएंगी।

और मैं खुल कर रो पड़ी। मम्मी की आंखें भी गीली हो चली थीं।
पापा ने गाड़ी को एक किनारे पर लगा कर रोक दिया था। वह पापा से बोलीं, हम घर को बेचेंगे नहीं, वो हमारा ही रहेगा। आज मणि ने मेरी आंखें खोल दीं। मैं तो पैसे की दौड़ में मां की ममता को ही भूल चुकी थी। शायद इन आठ सालों में मुशिकल से दो या तीन बार ही उनसे मिली थी और शायद यही कारण है कि वो भारत छोड़ कर जा रहीं हैं।
पापा बोले,  अभी भी देर नहीं हुर्इ है…… अगर हम समय पर पहुंच गए तो शायद हम मम्मी जी को रोक ही लें। मेरा दिल खुशी से नाच उठा। अब मुझे हवार्इ अड्डे  पहुंचने की जल्दी थी। हम थोड़ा देर से पहुंचे थे। दूर नानी जाती हुर्इ दिख रही थी। उनके नाम को बार-बार पुकारा जा रहा था। शायद वो हमारे इन्तजार में ही थीं।
मैं दूर तक उन्हें देख कर हाथ हिलाती रही किन्तु आंखों में इतना पानी भर रहा था कि वह कब ओझल हो गर्इं पता ही नहीं चला। उधर मम्मी भी बहुत उदास थीं।
पापा समझा रहे थे कि एक बार बस अम्मा को जाने दो, मैं बहुत जल्दी उन्हें वापिस लिवा आऊंगा। मैं बहुत खुश थी कि मेरी ममतामयी मां का स्नेह मुझे मिलेगा।
मम्मी मुझसे लिपट कर बच्चों की तरह रोने लगीं और मैं मम्मी की मम्मी बनी प्यार से उनके सिर को सहला रही थी।

बाल कहानी- नानी मां

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5. जब पौधे को हुर्इ फूड पायज़निंग

(बाल कहानी) जब पौधे को हुर्इ फूड पायज़निंग

मैं हूं नोनू। चौथी क्लास में पढ़ता हूं। पिछले कुछ दिनों से मैं उदास हूं। असल में, बात यह हुर्इ कि दस दिन पहले मेरा जन्मदिन था। पापा ने बहुत सुंदर-सा पौधा उपहार में दिया और मुझसे कहा कि इस पौधे की जिम्मेदारी मेरी है; अगर यह पौधा पूरे साल बढ़ता रहा तो वो मेरे अगले जन्मदिन पर मुझे दो पहियों वाली साइकिल दिलवाएंगे।

 

मैं बहुत खुश था। हमारे घर में पहले से ही ढ़ेर सारे पौधे हैं। मम्मी उनकी देखभाल करती रहती है। मैं मम्मी को देखता हूं। बस, पानी ही तो देना होता है। इसमें क्या मुशिकल काम है। मेरी साइकिल तो पक्की ही समझो। पौधा आने के बाद मैं बार-बार उसमें पानी देता ताकि जल्दी-जल्दी बड़ा हो। मेरे दोस्त विक्रम, सन्नी, मीशू और सामी भी पौधा देखने आए और उन्होंने अपने सुझाव दिए कि पौधे को जल्दी से बड़ा कैसे किया जाता सकता है।

इस बात को लगभग दस दिन हो गए हैं लेकिन आज पता नहीं क्यों मुझे मेरा पौधा चुप-चुप सा लग रहा था। मैंने मम्मी को आवाज देकर बुलाया और पौधा देखने को कहा। मम्मी ने प्यार से मेरे बालों में हाथ फेरा और गमले के पास बैठकर उसे ध्यान से देखने लगीं- ठीक वैसे ही जैसे डाक्टर मरीज को देखता है। मम्मी ने मुझसे पूछा कि पौधे को पानी कब-कब दिया। मैंने बताया कि दिन में चार-पांच बार पानी दिया और दो दिन पहले ही सर्फ के पानी से धोया था और उसी दिन से बार-बार फिनाइल भी ड़ाल रहा हूं ताकि आस-पास मच्छर ना आएं।

मम्मी मेरी बात सुनकर घबरा गर्इ और बोली, अरे! तुम्हारे पौधे को तो फूड पायज़निंग हो गर्इ है। मुझे समझ में तो कुछ नहीं आया पर इतना पता था कि कुछ बहुत बुरा हुआ है। मैं बहुत उदास हो गया। मम्मी ने बताया कि इसे बचाने के लिए इसका तुरन्त आप्रेशन करना पड़ेगा। मम्मी फटाफट खुरपी और घर के बाहर से ताजी मिट्टी ले आर्इं। उन्होंने एक खाली गमले में  भरी और उस पौधे को गमले से बहुत ध्यान से निकालकर नए गमले में आराम से खड़ा करके दबा दिया।

अब मेरा पौधा नर्इ मिट्टी और नए गमले में खड़ा था पर वह अब भी चुप था। नए गमले में धीरे-धीरे पानी डालते हुए मम्मी ने कहा कि तुम्हारे पौधे का आप्रेशन हो गया है पर अभी भी कुछ नहीं कहा जा सकता है। अगले तीन दिन में ही पता लग पाएगा कि पौधा ठीक है या मर गया है। मैं बुरी तरह से डर गया। मम्मी मुझे गोद में उठाकर रसोर्इ में ले गर्इ और मुझे ब्रैड देते हुए बोली कि पौधे को फिनाइल क्यों दी? मैंने बताया कि मेरे दोस्त विक्रम ने बताया था कि अगर पौधे को सर्फ के पानी से नहलाओगे तो वह साफ-सुथरा हो जाएगा और फिनाइल डालोगे तो कभी कीड़ा नहीं लगेगा, आसपास मच्छर भी नहीं आएगा। इससे पौधा जल्दी-जल्दी बड़ा होगा।

मैंने मम्मी से डरते-डरते पूछा कि यह फूड पायज़निंग…… क्या होती है। मम्मी ने बताया कि फूड मतलब खाना और पायज़न मतलब जहर…..। यानि खाने में जहर। पौधे को खाने में फिनाइल, सर्फ देकर जहर देने का ही काम किया है। पौधे की जड़ों में अगर यह जहर चला गया तो पौधा मर जाएगा और जड़ों में ज्यादा जहर नहीं फैला है तो शायद पौधा बच जाए। अब तो बस भगवान जी की दया चाहिए।

मैं भागकर मंदिर में गया और वहां से अगरबत्ती और माचिस ले आया। मम्मी ने गमले के पास अगरबत्ती जला दी। अब मैंने मम्मी को ध्यान से देखना शुरू किया कि वो पौधों की देखभाल कैसे करती हैं। कितनी बार पानी देती हूं। इन दो-तीन दिनों में मैंने भीगी हुर्इ दाल और पानी ही पौधे को दिया ताकि उसमे जल्दी-जल्दी ताकत आए। मेरे वाले पौधे के नीचे के तीन-चार पत्ते बिल्कुल सूख चुके थे। उधर विक्रम से मैंने कुट्टी कर ली थी क्योंकि उसकी वजह से ही मेरे पौधे का ये हाल हुआ था।
मुझे कल सुबह का इंतजार है क्योंकि जब मैं सोकर उठूंगा तो पूरे 72 घंटे हो जाएंगे। हे भगवान, मेरा पौधा ठीक हो जाए।
अगली सुबह, मैं जब उठा और गमले के पास भागा तो मम्मी जड़ से पौधे को निकाल रही थी और मुझे देखकर कहने लगीं कि वो पौधे को बचा नहीं पार्इ। मैं रोने लगा। मुझे साइकिल न आने का इतना दुख नहीं था जितना कि पौधे का इस तरह मर जाना था। मैं जोर-जोर से रोने लगा।
तभी मम्मी की आवाज मेरे कानों में पड़ी। अरे…….मैं तो सपना देख रहा था। मम्मी मुझे खुशी-खुशी बता रही थी कि आप्रेशन सफल हुआ। उस पौधे में एक नया पत्ता आ गया है। यानि अब पौधा बिल्कुल ठीक है। वह खतरे से बाहर है। मैं भागकर पौधे के पास गया और बहुत ध्यान से देखने पर एक छोटा-सा पत्ता दिखार्इ दिया। उस पर सुबह-सुबह की सूरज की रोशनी पड़ रही थी। वह हवा में आगे-पीछे झूल रहा था। ऐसा लग रहा था मानो खुशी में झूलता हुआ वह कह रहा हो कि मैं बिल्कुल ठीक हूं-अब मेरा ख्याल रखना। मैं भागकर मंदिर से अगरबत्ती और माचिस ले आया।
मम्मी ने मुझे प्यार किया और भगवान का नाम लेकर अगरबत्ती जला दी। मेरी डाक्टर मम्मी ने पौधे की बीमारी ठीक कर दी। अब मैं जान गया था कि पौधे की देखभाल कैसे की जाती है। मैं खुशी-खुशी स्कूल जाने के लिए तैयार हो गया क्योंकि दोस्तों को भी तो बताना था।

 

मासूम बचपन की आपको भी तो कोई न कोई बात जरुर याद होगी … मुझे जरुर बताना पर उससे पहले ये जरुर बताना कि ये कहानी  जब पौधे को हुर्इ फूड पायज़निंग   कैसी लगी :)

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6. बाल कहानी- भईया

बाल कहानी- भईया

दोपहर का एक बजा है। मैं चिलचलाती धूप में स्कूल से लौट रहा हूं। मेरा नाम मनन है और आठवीं क्लास में पढ़ता हूं। मेरा परिवार मध्यवर्गीय परिवारों में गिना जाता है। हमारे पास अपनी कार, घर और सुविधा का सामान है। मम्मी-पापा दोनों काम पर जाते हैं। एक भार्इ है जो कुछ दिनों पहले होस्टल चला गया है और अब उसे वहीं रह कर पढ़ार्इ करनी होगी

 

अचानक साइकिल चलते-चलते भारी हो गर्इ। मैंने रूक कर देखा तो पिछला टायर पंक्चर हो गया था। पैदल ही साइकिल को लेकर चलने लगा। कुछ ही दूरी पर साइकिल की दुकान थी. पहले पहल तो मैं  साईकिल पर भईया  के पीछे बैठकर स्कूल जाया करता  था। भर्इया साइकिल चलाते थे। लेकिन जबसे मेरे दोस्तों ने मुझे चिढ़ाना शुरू किया तो मैंने साईकिल छोड कर  स्कूल बस लगवा ली थी।

भर्इया साइकिल पर जाते और मैं बस से। दोनों अलग-अलग आते और अलग-अलग जाते। आपस में कामिपीटिशन करते कि कौन पहले घर पहुंचता है। घर पहुंचकर रिमोट हथियाना होता था। फिर शुरू होता था लड़ार्इ का दौर। मम्मी-पापा समझा-समझाकर हार जाते।
हमारे लड़ने-मनाने-रूठने का क्रम जारी रहता। भर्इया के होस्टल जाने के बाद मैंने बस छोड़कर साइकिल से जाना शुरू कर दिया था। अचानक ध्यान टूटा तो देखा सामने साइकिल वाले की दुकान आ गर्इ थी। मैंने उसे पंक्चर देखने को कहा और हैंडिल से पानी की बोतल निकालकर उसे पीने लगा।

अब कितने आराम से पानी पी रहा हूं। पहले भर्इया यह बोतल ले लेता था और पीते-पीते सोचने लगा कि अब कितने आराम से पी रहा हूं। पहले भर्इया यह बोतल ले लेता था तो घर में तूफान खड़ा हो जाता। लेकिन अब लड़ने वाला कोर्इ नहीं है। न चाहते हुए भी मेरी आंखें गीली हो गर्इं। जल्दी से आंखें पोंछी। स्कूल से बच्चे घर जा रहे थे। कुछ के भार्इ उन्हें लेकर जा रहे थे, तो किसी की मम्मी स्कूटी पर, वहीं कुछ भार्इ-बहिन पैदल बातें करते जा रहे थे। मैं इस भीड़ में स्वयं को अकेला महसूस कर रहा था।
भर्इया जब होस्टल जा रहे थे तो मैं कितना खुश था कि अब तो पूरे कमरे, कम्प्यूटर रिमोट, कुर्सी-मेज, अलमारी और साइकिल पर सिर्फ मेरा अधिकार होगा। कोर्इ रोकने-टोकने वाला नहीं होगा। तभी साइकिल वाले ने टोका, कोर्इ पंक्चर नही है। हवा भर दी है। सच पूछो तो अगर भर्इया घर पर होता तो सारा इल्जाम मैं उसी पर लगाता कि भर्इया ने ही साइकिल की हवा निकाली होगी।
खैर, मैं दुबारा साइकिल पर सवार होकर घर चल पड़ा। मम्मी दरवाजे पर खडी इंतजार कर रही थी। मैंने मम्मी को बताया कि साइकिल की हवा निकल गर्इ थी, इसलिए देर हो गर्इ। कमरे में आकर मैं कपड़े बदलने लगा। कमरा साफ-सुथरा था। सब कुछ व्यवसिथत। मम्मी ने खाना लगा दिया। टीवी चलाते हुए मम्मी ने कहा, तुम्हारा मनपसंद कार्टून चैनल लगा दूं। मैंने कहा, कुछ भी लगा दो मेरा मन नहीं है। मम्मी हैरान थी कि कहां मैं सारा दिन लड़ार्इ करके अपनी पसंद का चैनल लगा लेता था और अब देखने का मन नहीं है।

होस्टल से भर्इया जब पहली बार घर आया तो मैंने महसूस किया कि वो कुछ कमजोर सा हो गया है। पर उसे कुछ नहीं कहा। उसे तो मैं वैसे ही चिढ़ाता रहा और महसूस नहीं होने दिया कि मैं बोर भी होता हूं और मुझे उसकी याद आती है। घर पहले की तरह लड़ार्इ से गूंज उठा। वही सुबह बाथरूम पहले जाने की होड़, फिर नाश्ते में पहला परांठा किसका होगा, इस बात पर तकरार……। दो-तीन दिन रहकर भर्इया चला गया। मैं उसे बाय कहने के लिए भी नहीं उठा। हां, अपनी घड़ी में अलार्म जरूर लगा दिया था ताकि वो समय से उठ जाए और उसकी बस न छूटे।
मैं जानता हूं कि भर्इया पढ़ार्इ के मामले में बहुत सनकी हैं। अभी तक सभी कक्षाओं में वह प्रथम रहता आया है। आधा नम्बर भी कट जाता था तो भर्इया घर आकर खाना नहीं खाता था। भर्इया के होस्टल पहुंच जाने पर फोन आया तो मैंने बात नहीं की। मम्मी ने सोचा होगा कि अपने भर्इया से आखिर मैं बात क्यों नहीं कर रहा पर सच पूछो तो मुझे भी नही पता कि भर्इया के जाने से मैं खुश हूं या उदास। कभी-कभी भर्इया का फोन मैं उठाता हूं तो रिसीवर मम्मी या पापा को पकड़ा देता हूं। भर्इया होस्टल में बीमार भी हो गया था, पर मैंने उसकी तबियत नहीं पूछी। मुझे याद है पहले जब मुझे बुखार होता था तो रात को भर्इया मेरा माथा टटोलता कि बुखार ज्यादा तो नहीं हो गया।
खाना खाकर मैं पढ़ने बैठ गया। बहुत देर से एक सवाल हल नहीं हो पा रहा था। अब किसी पर गुस्सा भी नहीं कर सकता कि भर्इया पढ़ने नहीं दे रहा। हालांकि भर्इया चुटकियों में सवाल हल कर देता था। मैं किताब बंद करके लेट गया। मम्मी भी मेरे पास आकर लेट गर्इ। मम्मी की आंखों में मैंने बहुत बार आंसू देखे हैं, पर कभी कुछ नहीं बोला…….।
मम्मी ने अब काम पर जाना कम कर दिया है। शायद मेरी वजह से कि कहीं मुझे अकेलापन खलने न लग जाए। पापा हमेशा की तरह काम में व्यस्त रहतें हैं। हां, मेरे लिए खाना खाते समय मुझसे बातें करते रहते हैं। पर मेरा ध्यान उस समय टेलीविज़न में ही होता है।

भर्इया की पांच साल की होस्टल की पढ़ार्इ है। चाहे मैं बाहर से लड़ाका या गुस्सैल या जैसा भी हूं, पर मेरा ध्यान हरदम मेरे भर्इया में रहता है। शायद मम्मी-पापा इस बात को नहीं समझेंगे। मेरे दिल से सारी शुभकामनाएं मेरे भर्इया को हैं। वो अब भी हर साल प्रथम आए और जो बनना चाहता है वो बने। लेकिन मुझे भर्इया की याद आ रही है, भर्इया घर कब आएंगे……..। मैं आज भी अपने मुंह से कुछ नहीं कहूंगा…..। और मैं दुबारा उठकर सवाल हल करने में जुट गया कि भर्इया हल कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं………….।

ये कहानी दिल के बहुत नजदीक है पता नही लिखते हुए कितनी बार आखे भर आई और इसे जब भी पढती हूं तो भी आखें नम हो जाती है … !!! सच बताना कि आपको कैसी लगी बाल कहानी- भईया

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7. सबसे प्यारा तोहफा

(बाल कहानी)   सबसे प्यारा तोहफा

 

मैं हूं मणि। अभी कल ही दस साल की पूरी हुर्इ हूं। यानि मेरा कल हैप्पी बर्थ डे था। सप्ताह भर पहले से ही मेरी योजनाएं बन रही थी कि मैं जन्मदिन वाले दिन क्या पहनूंगी, क्या-क्या बनवाऊंगी मम्मी से…… मम्मी का नाम लेते ही मेरा मन फिर उदास हो गया था। आप जानना चाहेंगे कि क्यों मेरा मन उदास हो गया! चलो, कोर्इ और बात करने से पहले मैं इसी बारे में आपसे बात करती हूं।

असल में, पता है क्या बात है! मैं, मम्मी को बहुत प्यार करती हूं , उनका कहना मानती हूं, जो घर में कभी मेहमान आए तो मम्मी की मदद करती हूं , लेकिन पता नही हमेशा मम्मी की ड़ांट ही खानी पड़ती है। ना जाने मम्मी मुझ से क्यों नाराज-नाराज उदास सी रहती हैं। मेरी हर बात में कमी निकालती हैं। कभी भी मेरी तारीफ नहीं करती। पापा की बात ही क्या, वो तो महीने में 20 दिन टूर पर रहते हैं, जब आते हैं तो उनका सोशल सर्किल ही इतना बड़ा है कि उसमें व्यस्त रहते हैं।

अभी मेरे जन्मदिन के आने से पहले मैंने मम्मी को अपनी सहेलियों की लिस्ट थमा दी तो मम्मी ने कोर्इ खुशी नहीं दिखार्इ। मैं कुछ नहीं बोली। जन्मदिन को आने में चार दिन बाकी थे।
मैंने मम्मी को कहा कि अपनी सहेलियों को बुलाने का क्या समय दूं ? मम्मी ने कहा कि अभी कल बात करेंगे, आज शाम तेरी नानीजी आ रही हैं।

मैं हैरान……! नानीजी की सूरत मैंने एलबम में ही देखी है। जब मैं दस दिन की थी तब मुझे गोद में लिए…. मुझे नहलाते हुए….. मेरी मालिश करने की ढ़ेरों तस्वीरें हैं…… मैं बहुत खुश होती थी देख कर…… और आज….. इतने सालों बाद वो आ रही हैं….. वो भी मेरे जन्मदिन पर……मैं तो खुशी के मारे दोहरी हुर्इ जा रही थी।

शाम हुर्इ……… नानीजी आ गर्इं। हाथों, गालों पर बेशुमार झुर्रियां……. शायद उम्र का ही तकाजा था। मैं नानीजी से लिपट गर्इ। उन्होंने मुझे प्यारा सा गुड्डा और सौ रूपये उपहार स्वरूप दिए। मम्मी काम में लगी रहीं। मैंने एक बात पर ध्यान देना शुरू किया कि मेरी नानीजी मम्मी को बात-बात पर टोक रहीं थी।

दोपहर के खाने में भी उन्होंने ढ़ेरों नुक्स निकाल दिए। चादर ठीक से ना धुलने पर लम्बा सा लेक्चर दे डाला। मम्मी चुपचाप अपने काम में लगी रहीं। मुझे कुछ अच्छा महसूस नहीं हो रहा था। मन बहुत बेचैन था कि नानी आखिर मम्मी से ऐसा बर्ताव क्यों कर रही है? मेरे बाल-सुलभ मन में एक बात यह आ रही थी कि मम्मी की मम्मी यानि मेरी नानी अपनी बेटी के साथ ऐसा व्यवहार करती हैं, तो कभी ऐसा तो नहीं है कि इसलिए मेरी मेरी मम्मी भी मेरे साथ यही व्यवहार करती हों। पर मैंने मन में सोचा कि मैं तो मम्मी के साथ इतनी अच्छी तरह पेश आती हूं, तो यह वजह तो हो ही नहीं सकती। समय ऐसे ही बीतता रहा। मैं अपने काम में व्यसत रही पर सब कुछ देखती समझती रही।

जन्मदिन से एक दिन पहले मम्मी कपड़े प्रेस करते वक्त बुदबुदा रही थी कि मम्मी हमेशा से ही ड़ांटती आर्इ हैं। अगर मैं लड़का नहीं तो इसमें मेरा क्या दोष……..। यह कह कर मम्मी आंसू पोंछने लगी……
मैं मम्मी के पीछे ही खड़ी थी पर मम्मी को पता ना था। नानीजी बाजार शापिंग के लिए गर्इ हुर्इ थी। मैंने प्रेस का स्विच बंद किया और मम्मी का हाथ खींच कर अपने कमरे में ले गर्इ। मम्मी ने मुझे उस समय कुछ नहीं कहा। मैंने मम्मी के माथे पर प्यार किया। उस समय मेरी आवाज भी थोड़ी भर्रा गर्इ थी। मम्मी, क्या हुआ! मैंने बहुत प्यार से पूछा। मम्मी ने किसी छोटे से आज्ञाकारी बच्चे के समान ना की मुद्रा में गर्दन हिला दी। मैंने पूछा, आप भी मुझे इसलिए प्यार नहीं करती ना, क्योंकि मैं लड़की हूं। मम्मी ने यह सुनते ही मेरे मुंह पर हाथ रख दिया और आंखों से आंसुओं की बरसात होने लगी। मम्मी बोली, बचपन से ही मैं यही सुनती आर्इ हूं। मेरी मां हमे मुझे ही कोसती थी। फिर जब तू हुर्इ तो मुझे और अपमान झेलना पड़ा। मैंने कहा, मां, क्या मैंने आपकी कभी ऐसा महसूस होने दिया कि मैं लड़की हूं। साइकिल चला कर बाजार के सारे काम करके लाती हूं। रेडि़यो ठीक कर देती हूं। गैराज से गाड़ी तक भी बाहर खड़ी कर देती हूं। फिर आप ऐसा क्यों सोचती हैं? नानी की बात ठीक थी। उस समय जमाना और था। अब जमाना बदल गया है। आज के समय में लड़कियां बहुत कम अनुपात में रह गर्इ हैं। बलिक आज के समय में तो लड़की होने पर आपको गर्व होना चाहिए। मम्मी चुपचाप सब बातें सुन रही थी।
मम्मी, मैं आपको और पापा को बहुत प्यार करती हूं और मैं चाहती हूं कि आप भी मुझे उतना ही प्यार दें।

मम्मी ने मुझे गले से लगा लिया और बोली, कर्इ बार मैं भी यही सोचती थी कि मैं तुम्हें खूब प्यार करूं, पर फिर सोचती थी कि जब मुझे अपनी मम्मी से प्यार नहीं मिला तो मैं तुम्हें प्यार क्यों दूं। तुम्हें मैं वही देने लगी जो मुझे अपने घर से मिला। लेकिन मैं वाकर्इ में गलत थी। मेरी प्यारी बच्ची…..मुझे माफ कर दे……! इतने में नानीजी की आवाज आर्इ ओ……..मणि की मां…… दरवाजा तो खोल………मेरे दोनों हाथ भरें हैं…..! मम्मी और मैं दोनों मुस्कुरा दिए।

मम्मी मुझे भली प्रकार समझ चुकी थी। और मेरा जन्मदिन खूब धूमधाम से मनाया गया। नानीजी की अब मुझे परवाह नहीं थी। लेकिन उन्हें आदर-मान देने में मैंने कोर्इ कसर नहीं छोड़ी। नानीजी की आंखें भी खुली की खुली रह गर्इं, जब मेरी एक सहेली विडियो से हमारी पिक्चर बना रही थी और दूसरी फटाफट स्कूटी पर जाकर कोल्ड ड्रिंक्स ला रही थी।

मैं बहुत ही खुश थी। मुझे मम्मी का प्यार मिल गया था, जो कि मेरा सबसे बड़ा तोहफा था। जन्मदिन से अगले दिन पापा का टूर भी खत्म हो गया था। पापा दो दिन घर पर ही रहने वाले थे। पापा मेरे लिए बहुत ही सुंदर डाल लाए थे। जहां इतनी बड़ी, प्यारी गुडि़या देखकर मम्मी और मैं हैरान हो गए, वहीं नानीजी का मुंह बन गया कि गुड्डा ना ला सकता था क्या, जो गुडि़या ले आया।
लेकिन पापा हंसते हुए बोले कि इस घर में गुडि़या के लिए भी तो एक गुडि़या चाहिए। यह बात सुनते ही मम्मी तो शरमा गर्इ। पर मैं समझ गर्इ और अपनी सहेलियों को गुडि़या दिखाने भाग गर्इ।

तो कैसी लगी आपको सबसे प्यारा तोहफा कहानी … आप जरुर बताना :)

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8. Acting

(बाल कहानी) Acting

टोटके हिचकी के

मैं हूँ मणि। वैसे तो मैं आठवीं कक्षा में पढ़ती हूँ। पर सब मुझे दादी अम्मा कहतें हैं। मैं सभी की मुसीबतें पल भर में भगादेती हूं या  फिर किसी ने शरारत से किसी के कपड़ों पर स्याही छिड़क दी या सार्इकिल स्टैंड़ से किसी ने सार्इकिल की हवा निकाल दी कर उसे गिरा दिया हो तो सभी सिर्फ मेरे पास भागे चले आते और मैं अपने काम में जुट जाती। वैसे यह सब मैंने अपनी मम्मी और दादी मां से सीखा है। हम संयुक्त परिवार में रहते हैं न इसलिए मैं सभी बातों का ध्यान रखती हूँ। मेरी दादी तो सुबह.शाम लोगों की परेशानिया ही दूर करती रहती है। घर में तो मेरा रोब नहीं चलता पर स्कूल में बड़ी स्मार्ट बनती हूँ। किसी की दोस्ती करवानी हो या फिर पक्की कुÍा, मैं सभी कामों में एकदम एक्सपर्ट हूँ।

एक बार की बात है। मैं, मीशू और नोनू खेल रहे थे। सन्नी तो खेल कर चला गया था। सामी अभी तक आया नहीं था। आकाश में बादल से आ गए इसलिए मैंने सोचा कि जल्दी घर चलतें हैं, हम पार्क से निकल ही रहे थे कि सामी आ गया। वो हमारा पड़ोसी है, पढ़ता तो मेरी कक्षा में है पर स्कूल दूसरा है। उस समय उसे हिचकी आ रही थी। वो खेलना चाह रहा था लेकिन मैंने मना कर दिया। उसने मुझसे कहा कि तुम तो ऐसे भाग रही हो जैसे काला कुत्ता देख लिया हो।

मैंने उससे कहा कि काला कुत्ता तो नहीं पर एक काली गाड़ी जरूर देखी है। सामी बोला. काली (हिचकी) कार। मैंने पूछा पहले तू बता कि हिचकी कैसे आ रही है। वो बोला घर के (हिचकी) बाहर चने वाला (हिचकी) खड़ा था उसमें (हिचकी) मसाला बहुत तेज था बस…. हिचकी (हिचकी) लग गर्इ (हिचकी) अब बताओ…….. (हिचकी) मैंने बोला हम अभी जब खेल रहे थे तो हमने देखा कि एक बहुत सुंदर लड़की रोती हुर्इ गाड़ी में बैठी है। मुझे लगा कि शायद वो तुम्हारी कक्षा की दीपा है। सामी बोला.दीपा…. (हिचकी) कटे हुए थे। मैंने कहा हां-हां। वो बोला कि दो काले कपड़़े पहने अंकल उसे गाड़ी में बैठा रहे थे, शायद उठा कर न ले जा रहे हों। सामी का मुंह खुला ही रह गया (हिचकी) तुम्हारा मतलब……………. किड़नैप। मैंने भी गर्दन हिला दी। वो उतावला हो उठा। बोला (हिचकी) चलो जल्दी चलते हैं (हिचकी) कहीं पुलिस की पहुंच से दूर हो गये तो…… मैंने भी जल्द बाजी दिखार्इ और पार्क के बाहर सामी के साथ मीशू और नोनू भी लपक लिए।

सामी ने मुझसे पूछा, तुम्हें पुलिस स्टेशन का पता है ? मैंने कहा हां.हां। चलो जल्दी चलें। सामी नाराज हो गया बोला दीपा किड़नैप हो गर्इ है और तू हँस रही है। मैंने हँसते हुए कहा बुद्धु। कोर्इ किड़नैप विड़नैप नहीं हुआ है बस……………. तेरी हिचकी रोकने का नाटक था। सामी हैरानी से खड़ा का खड़ा रह गया। मैंने कहा ये था…………… शाक टि्रटमेंट। जब हिचकी रोकनी हो तो ध्यान दूसरी ओर लगा देते हैं जिससे हिचकी रूक जाती है। अब माहौल थोड़ा हल्का हो गया था।

हम सब मिलकर हँसने लगे और सड़क पार करने लगे। सामी ने बताया कि यही चने वाला है पर इसके चने है बहुत स्वादिष्ट। हम चारों ने मिलकर चने खाए। सामी अभी तक हैरान था कि मैं कितनी बातूनी हूँ और  Acting भी अच्छी कर लेती हूँ। तभी मुझे उसमें मसाला इतनी तेज लगा कि मुझे ही हिचकी लग गर्इ। सामी, मीशू, नोनू हंसने लगे कि अब Acting बंद करो। लेकिन मैंने कहा कि मुझे (हिचकी) सचमुच हिचकी लग गर्इ (हिचकी) हैं। तभी सामी बोला कि मेरे पीछे काला कुत्ता खड़ा है। उसे पता था कि मैं काले कुत्ते से बहुत ड़रती हूँ पर मैंने कहा मुझे (हिचकी) मेरी (हिचकी) तू मजाक कर (हिचकी) रहा है ताकि मेरी हिचकी रूक जाए। हंसते-हंसते मैंने पीछे मुड़कर देखा तो मेरी सांस ऊपर की ऊपर अटकी रह गर्इ। यह सचमुच का शाक (झटका) था।

मेरी हिचकी का तो पता नहीं पर जो मैं वहां से दौड़ी मैंने सांस घर आकर ही लिया। मीशू, नोनू और सामी दूर खड़े मुझे देखकर हाथ हिला रहे थे और मैं दिल की धड़कनों को काबू में रखकर उन्हें बाय कर रही थी। वैसे एक बात बता दूं मेरी दादी और मम्मी कुत्तों से बिल्कुल नहीं डरती पर पता नहीं इन कुत्तों को देखकर मेरी घिग्घी क्याें बंध जाती है। अंदर पहुंची तो दादी किसी से बतिया रही थी। मैं भी दादी के साथ बैठकर उनकी बातों में हामी भरने लगी और यह सोचने लगी कि क्या बहाना लगाऊंगी कि मैं क्यों भागी ताकि मेरे दोस्तों के बीच कल मेरा मजाक ही न बन पाए।

तो नन्हें  दोस्तो.  कैसी लगी आपको  Acting   कहानी जरुर बताना :)

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9. काम ही काम

(बाल कहानी ) काम ही काम

मैं हूं गोलू। पता है अभी-अभी पांचवीं कक्षा में आया हूं। बाप रे….बहुत पढ़ार्इ है। स्कूल से वापिस आने के बाद बस…….पढ़ते रहो…….पढ़ते रहो……!! एक दिन बरसात बहुत तेज हो रही थी इसलिए मैं उस दिन स्कूल नहीं गया। उसी दिन हमारी टीचर ने गणित के दो पाठ पढ़ा दिए। अगले दिन स्कूल जाने पर पता चला तो बहुत दु:ख हुआ क्योंकि टीचर से पढ़े बिना गणित के पाठ को समझना बहुत कठिन था। मैं परेशान इसलिए हो गया था कि टीचर ने अगले दिन उसका टेस्ट लेना था। उधर पापा-मम्मी के साथ मुझे किसी अंकल की शादी में भी शामिल होना था। पर पढ़ार्इ की वजह से मैंने शादी में जाने सेे मना कर दिया क्योंकि मैंने मन ही मन ठान रखी थी कि वो सवाल तो मैं हल करके ही रहूंगा। मम्मी ने मुझे लालच दिया कि वहां फलूदा आर्इसक्रीम होगी, गोलगप्पे होंगे, पाव-भाजी होगी, पर मेरे मन में तो गणित के सवाल घूम रहे थे सो मैंने शादी में जाने से मना कर दिया।

मम्मी पहले तो मुझे साथ में जाने के लिए मनाती रही पर मेरे बार-बार मना करने पर तो गुस्सा ही हो गर्इ और गुस्से में बोली, ठीक है……..नहीं जाना तो मत जाओ। मम्मी दूसरे कमरे में तैयार होने लगी। पापा ने भी तैयार होना शुरू कर दिया। मैं सवाल हल करने में जुट गया। तभी मम्मी की आवाज आर्इ। वह बोल रही थी कि बार्इ आने वाली होगी। उसे कहना कि मेज के नीचे से अच्छी तरह झाडू लगाए। आजकल काम बहुत गंदा करने लगी है और ना ही उसका कोर्इ समय है आने का…..जब मन आता है चली आती है।  ठीक है, मैंने कहा और फिर दुबारा सवाल हल करने लगा।

 

 

तभी फिर आवाज आर्इ कि शायद गैस वाला भी आ जाए। गैस चैक करके ही रखवाना। आजकल ये लोग गड़बड़ी बहुत करने लगे हैं। मैंने फिर आवाज देकर कहा, ठीक है, देख लूंगा। और फिर सिर खुजलाने लगा क्योंकि मैं सवाल हल नहीं कर पा रहा था।

इतने में मम्मी तैयार होकर आर्इ और कहने लगी कि तौलिया धूप में डाला है। अगर बरसात हो जाए तो अंदर ले आना। और हां, नीतू की मम्मी का फोन आएगा रेखा आंटी का नम्बर लेने के लिए। डायरी में आर के आगे उनका टेलिफोन नंबर लिखा है, बता देना।
पापा बाहर जाकर गाड़ी स्टार्ट करने लगे और मम्मी जाते-जाते मुझे हिदायत देने लगी कि टेलिविज़न बिल्कुल मत देखना। पढ़ार्इ के लिए घर रूके हो तो पढ़ार्इ ही करना, फिर थोड़ा-सा रूककर मम्मी बोली- Þशाम को पांच बजे कर्इ बार पानी इतना तेज आता है कि छत वाली टंकी से पानी गिरने लगता है। मोटर के पास वाल्व को उलटा घुमा देना, पानी गिरना बंद हो जाएगा। खाना और नमकीन रसोर्इ में रखा है, मन करे तो खा लेना।
मेरा सिर वैसे ही इतने काम सुनकर चकरा रहा था। मैंने मम्मी को आवाज देकर पूछा कि क्या वो पांच मिनट रूक सकती हैं क्योंकि अब मैंने भी उनके साथ शादी की पार्टी में जाने का मन बना लिया है। मम्मी बड़बड़ाती हुर्इ पापा को बताने चली गर्इ कि मैं भी साथ चल रहा हूं। मम्मी तैयार होने में मेरी मदद कर रही थी और गुस्से में बोल रही थी- जल्दी-जल्दी तैयार हो जाओ।

पर मैं मुस्कुरा रहा था क्योंकि बात सिर्फ दो-तीन घंटों की ही है। घर पर इतने कामों में तो मेरी पढ़ार्इ होने से रही। दो घंटों बाद वापिस आ ही जाएंगे तो आराम से कमरा बंद करके पढ़ार्इ कर लूंगा।

पापा ने गाड़ी स्टार्ट कर दी थी और मैं भाग कर मम्मी के साथ गाड़ी में बैठ गया।

कैसी लगी आपको मेरी कहानी जरुर बताईएगा :)

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10. मैं हूं मणि

(बाल कहानी)   मैं हूं मणि

ऐसी ही हूँ मैं…

सुबह का समय……! मैं यानि मणि, स्कूल जाने के लिए तैयार हो रही हूँ पर मैंने जुराबें कहां रख दी मिल ही नही रही। बेल्ट भी देखने के लिए पूरी अलमारी छान मारी पर जब मम्मी मेरा स्कूल बैग ठीक करने लगी तब देखा उसी बैग में बेल्ट पड़ी थी। एक जुराब ना मिलने से अलमारी से दूसरा जोड़ा निकाल कर दिया। मेरा कमरा ऐसा हो रहा था मानो अभी-अभी भूकम्प आया हो। वैसे यह आज की बात नहीं है। मैं ऐसी ही हूँ। कमरा साफ-सुथरा रखना मेरे बस की बात नहीं………… वैसे मैं अभी तीसरी कक्षा में ही तो हूँ।

फिर पढ़ार्इ के अलावा मुझे पता है कितने काम होतें हैं….. गिनवाऊँ……… ओ.के. गिनवाती हूँ। पापा के पैरों पर खड़े होकर उन्हें दबाना, मम्मी की टेढ़ी-मेढ़ी चोटी बनाना, मटर छीलते समय उन्हें खाना ज्यादा डि़ब्बे में ड़ालना कम…….और….और…. पापा के हाथों व पैरों की उंगलियां खींचना, दादाजी की पीठ पर कंधे से खुजली करना…….ऊपर से पढ़ार्इ….पढ़ार्इ और पढ़ार्इ……….. है ना कितना काम। ओफ………..बस का हार्न बजा………… लगता है मेरी स्कूल बस मुझे लेने आ गर्इ है……….।

दोपहर के दो बजे मैं स्कूल से लौटती हूँ। उस समय मुझे अपना कमरा चमकता-दमकता मिलता है। यही हर रोज होता है।

हर सुबह मेरी तलाश, खोजबीन जारी रहती है और मम्मी मेरी हमेशा सहायता करती है क्योंकि ऐसी ही हूँ मैं…..। एक दिन मम्मी को कहीं जाना था तो मम्मी ने मुझे सुबह ही घर की डुप्लीकेट चाबी थमा दी। चाबी अक्सर मैं गुम कर देती हूँ इसलिए मम्मी मेरे गले में पहने काले धागे में चाबी ड़ाल देती हैं इससे चाबी गुम नहीं होती। मैं स्कूल से लौटी तो घर पर ताला लगा था। मैंने घर खोला और अंदर से बंद कर लिया। मम्मी मुझे हिदायत देकर गर्इ थी क्योंकि हमारे शहर में चोरियां बहुत हो रही थी।

हमेशा की तरह मैंने साफ-सुथरे घर को गंदा कर दिया। स्कूल बैग जमीन पर पटका। बेल्ट कहीं, जुराबें कहीं और कौन सी ड्रेस पहनूं के चक्कर में सारी अलमारी अस्त-व्यस्त कर दी। ड्रेस मैंने निकाली पर अलमारी बंद नहीं की क्योंकि ऐसी ही हूँ मैं।

फि्रज में से कोल्ड़ डि्रंक निकाला और ठाठ से लेट कर टीवी देखने लगी। बार-बार चैनल बदले जा रही थी। क्योंकि मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या देखूं और क्या न देखूं। फिर मम्मी की ड्रेसिंग टेबल वाली दराज खोल कर बैठ गर्इ कि मम्मी की सारी चूडि़यां, बिन्दी ठीक कर के लगाती हूँ। इसी बीच घर की लाइट चली गर्इ। मैं बोर होने लगी। मम्मी अभी आर्इ नही थी। मैंने सोचा कि घर बंद करके अपनी सहेली सुधा के यहां चली जाती हूँ। फिर मैंने घर ढंग से बंद किया और सुधा के घर गुडि़या-गुडि़या खेलने चली गर्इ ।

शाम हो गर्इ थी। मम्मी को सुधा की मम्मी से कुछ काम था इसलिए वो बाजार से सीधा ही सुधा के घर आ गर्इ। मुझे वहां खेलते देख उन्होंने गुस्सा किया कि पढ़ार्इ कब करूंगी और पापा भी बेचारे दफ्तर से आ गए होंगे और बाहर ही खड़े गुस्सा हो रहे होंगे।

मैं खेल भूल कर तुरन्त मम्मी के साथ घर चल पड़ी। घर गर्इ तो बाहर पापा और उनके दोस्त परेशान से खड़े थे। पापा ने बताया कि वह पाँच मिनट से बाहर खड़े हैं। घर का ताला तो बंद है पर अंदर से हल्की-हल्की आवाजें आ रही है। पीछे की खिड़की भी खुली है। वैसे पड़ोस के जैन साहब ने बताया कि उन्हाेंने पुलिस को फोन भी कर दिया है। पापा गुस्से से मुझे ही घूरे जा रहे थे। सभी अंदाजा लगा रहे थे कि पता नहीं, भीतर कितने लोग हैं।

पुलिस भी आ गर्इ। मम्मी ने घर की चाबी पुलिस वालों को दे दी। दोनों पुलिस वालों ने दरवाज़ा धीरे से खोला और धीरे-धीरे कमरे में प्रवेश किया। भीतर वाले कमरे से हल्की-हल्की रोशनी व आवाजें भी आ रही थी। एक पुलिस वाले ने भीतर से बाहर आकर यह रिर्पाट दी।

मेरी मम्मी भी पूरी तरह से घबरा गर्इ। पता नहीं क्या हो रहा होगा। तभी दूसरे वाला पुलिस मैन बाहर अपनी बन्दूक लेने आया तो उसने बताया कि भीतर का कमरा बिल्कुल फैला हुआ है। ऐसा लग रहा है मानो पूरी खोजबीन की हो। पांव तक रखने की जगह नहीं है। मैं तो बिल्कुल ही रूआंसी हो गर्इ। पापा-मम्मी दोनों मुझे गुस्से से देख रहे थे। आसपास के पड़ोसी भी इकटठे हो गए। चारों तरफ फुसफुसाहट हो रही थी।
तभी भीतर गए पुलिस वाले ने मेरे पापा को आवाज देकर भीतर बुलवाया। पिताजी ड़रते-ड़रते अन्दर गए फिर उन्होंने मेरी मम्मी और मुझे आवाज दी। हम दोनों भी अंदर गए। अन्दर जाकर देखा तो भीतर कोर्इ नहीं था। सिर्फ पापा और दो पुलिस वाले थे और हां कमरे में टीवी जरूर चल रहा था।
मुझे याद आया कि टीवी तो मैं चलता ही भूल गर्इ थी। बिजली चले जाने के कारण मुझे टीवी को बंद करना ध्यान ही नही रहा।

पुलिस वाले अंकल पापा को कह रहे थे कि वह तो इतना बिखरा कमरा देख कर हैरान थे और सोच रहे थे कि इतना तो चोर ही चोरी करते वक्त कमरा फैला कर जाते हैं।

पापा-मम्मी मेरी तरफ घूर कर देख रहे थे। मुझे एक तरफ तो खुशी थी घर में चोर नहीं है लेकिन पुलिस वालों के आगे मुझे बहुत बेइज्जती महसूस हुर्इ क्योंकि वह सारा कमरा तो मैंने ही फैलाया था…….। पुलिस अंकल मुझ से पूछने लगे कि क्या मैंने ही यह कमरा फैलाया है।

 

cute little girl photo

मैं जोर से रो पड़ी और कहने लगी कि प्लीज़ अंकल आप मेरी शिकायत किसी से मत करना। सारी गलती मेरी थी। मैं ऐसी ही हूँ। स्कूल से आकर सारा कमरा फैला देती हूँ। फिर टीवी देखते-देखते लाइट चली गर्इ। मैंने खिड़की खोल दी पर…. घर पर बोर हो रही थी तो मैं बिना खिड़की, टीवी बंद किए ही सुधा के घर खेलने चली गर्इ। पर बाहर से ताला जरूर लगा गर्इ।

पुलिस वाले अंकल ने बताया कि फिर शाम हुर्इ, अंधेरा हुआ तो टीवी की हल्की-हल्की आवाज और कम ज्यादा होती रोशनी से ऐसे लगा कि घर पर कोर्इ है और खुली खिड़की देख कर तो मन का शक पक्का हो चला। मैं रो रही थी। पर मुझे सबक मिला चुका था। मैंने मम्मी-पापा और पुलिस अंकल से वायदा लिया कि मैं आगे से ऐसा नहीं करूंगी। कमरा ठीक रखूंगी। दो-तीन दिन बाद फिर वही रोज मर्रा की तरह कमरा फैलाना शुरू हो गया क्योंकि…….. ऐसी ही हूँ मैं…….. है ना!

 

कैसी लगी आपको ये कहानी जरुर बताईगा :)

मैं हूं मणि

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11. अजय का सपना

अजय का सपना जब कोई बच्चा नया नया पढना सीखता है तो उसे कहानियां पढने का बहुत शौक होता है पर ज्यादा मात्राओं की समझ  न होने के कारण वो पढ नही पाता  इसलिए मैने कुछ अलग अलग प्रयास किए ताकि वो बच्चे जिन्होने हाल ही मे पढना सीखा है और मात्राए लगाना नही जानते बस आ की मात्रा ही आती है ये कहानी उन बच्चों के लिए है देखिए कैसे फटाफट पढ लेंगें वो ये मजेदार बाल कहानी

अजय का सपना

(वह बच्चें जिन्होनें अभी सिर्फ आ की मात्रा लगाना सीखा है वे यह बाल कथा पढ़ सकते हैं क्योंकि इसमें सिर्फ आ की मात्रा का प्रयोग किया गया है।)

अजय चार साल का नटखट बालक था। अमन उसका बड़ा भार्इ था। अमन समझदार था। वह समय पर पाठशाला जाता। अमन पाठ याद करता पर अजय का जब मन करता तब जाता जब मन ना करता तब बहाना बना कर घर पर ठहर जाता। वह पापा का लाड़ला था। अमन सब समझता था। वह पाठशाला जाता-जाता यह गाना गाता जाता कल बनाना नया बहाना।

एक बार अचानक आवश्यक काम आ गया। माँ तथा पापा कार पर शहर गए। अजय साथ जाना चाह रहा था पर पापा दरवाजा बंद कर बाहर ताला लगा गए। बस, घर पर अजय तथा अमन रह गए।

अमन छत पर समाचार पत्र पढ़ रहा था। उस पर बदमाश तहलका लाल का नाम छपा था। वह तलवार वाला खतरनाक बदमाश था। अजय उसका नाम जानकर ड़र गया। अचानक आसमान पर काला बादल छा गया। घर का दरवाजा खट-खट बज उठा। अजय छत पर ड़रकर खड़ा गाल पर हाथ रखकर पापा-पापा रट रहा था।

यकायक वह बदमाश छत पर आ टपका। उसका रंग एकदम काला था। हाथ पर लाल कपड़ा बंधा था। वह तलवार पकड़ अजय पर लपका तथा हंसा। जब बालक पाठशाला ना जाता, तब हम आता उसका कान काट का जाता, हा! हा! हा!

अजय अचानक ड़र कर मचल गया। वह जाग गया। वाह! वह सब सपना था। अमन पाठशाला जाकर घर आ गया था तथा खाना खा रहा था। बाहर आसमान साफ था। वह माँ, पापा, अजय आवाज लगाता भागा तथा अपना सारा सपना बताया।

अब वह कल पाठशाला जाना चाह रहा था। अमन खाना खाता, मजाक बनाता कह उठा, हाँ……..हाँ कल बनाना नया बहाना पर अजय कह उठा कल बहाना ना बनाऊँगा झटपट उठकर पाठशाला जाऊँगा तथा अपना कान पकड़ कर हँस पड़ा।

अजय का सपना बहुत साल पहले राजस्थान पत्रिका जयपुर से भी प्रकाशित हुई थी. आप बताओ कि आपको कहानी कैसी लगी !!!

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12. Story Time

Story Time

W की मिठा E
(अंग्रेजी वर्णमाला से बनी कहानी का आनन्द लो)

W बहुत ही छोटा पर शरारती बच्चा था। मम्मी k कहने पर उस k  डैD  ने  उसे A टू Z Vधालय में भर्ती करवा दिया। उनका Vधालय   jल  K पास होने कारण वहाँ अक्सर c पाही घूमते रहते थे। बच्चों को उन्हें देखना अच्छा लगता था। सड़क K  दूसरी  Oर Bकानेरी नमकीन और Kक की दुकानें थी। बच्चों की पाठशाला में उन्हें पढ़ार्इ के साथ-साथ अच्छी-अच्छी बातें भी C खाते थे।

Aक बार उनकी कक्षा में नोटिस आया कि जो बच्चा सबसे अच्छी Cख अथवा Vचार देगा उसे प्राध्यापिका E नाम में मिठाE देंगी W तो नया-नया ही Vधालय गया था, पर मिठाE का नाम सुनते ही उसके मुँह में पानी आ गया।

उनकी नैंC   Tचर कक्षा में आर्इ और एक-एक बच्चें को अपने पास बुलाकर उनK Vचार और  Cख सुनने लगी।

सबसे पहले  Aकता ने बताया कि kला खाकर छिलका कूड़ेदान में ही फैंकना चाहिए। Tटू बोला दूध Pकर ताकतवर बनना चाहिए।

मUर बोला जब दो लोग बातें कर रहें हों तो Bच में नहीं बोलना चाहिए। कPश ने बताया कि सभी से Sसी वैसी बातें ना करके Cधे मुँह बात करनी चाहिए। कभी भी Pठ  Pच्छे नहीं बोलना चाहिए। Bना ने कहा के Eश्वर में Vश्वास रखना चाहिए। उनकी पूजा करके Rती उतारनी चाहिए।

Dम्पी चुप बैठा था। Tचर के पूछने पर उसने बताया कि वो Bमार है। अब बारी आर्इ की। खाने के शौकीन ने बताया कि ज्यादा  Kक और Iस्क्रीम नही खानी चाहिए Qकि कर्इ बार चटपT चीजों से भी पेट दर्द हो जाता है, इसीलिए हल्का खाना ही खाना चाहिए। यह सुनकर सभी बच्चे हँस पड़े।

Gतेन्द्र आज कक्षा में नही आया था क्योंकि वो Cकर (राजस्थान) गया था।

सिY   Oमी,  Uवी, Eना और Eशा के इलावा सभी ने अपने Aचार  Vर को बताए। उधर Tना चुपचाप बैठी रही Qकि वो घर से लड़कर I थी।

T चर सभी बच्चों के Vचार लेकर प्राध्यापिका के पास गर्इ।

उन्हें सभी बच्चों के Vचार इतने पसन्द आए कि खुश होकर उन्होने सभी बच्चों को मिठाE  Eनाम में दी। बच्चों ने Aक साथ मिलकर मिठाE  खार्इ और इतने में छुटटी की घंT भी बज गर्इ।

Publised in 98 in  Rajisthan Patrika Jaipur  articel in rajasthan patrika

कहानी कैसी लगी … जरुर बताईएगा :)

 

 

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13. बाल कहानी

बाल कहानी   100रभ की 6तरी

( अंको को शब्दों के साथ जोड़कर कहानी का आनन्द लें)

2पहर के समय बर7 शुरू हो गर्इ। स्कूल से लौटते समय 100रभ ने अपनी कमीज की आस् 3 ऊपर कर ली थी। उसने पिताजी को बहुत बार 6तरी लाने को कहा था पर वो टाल देते थे। आज उसका जन्मदिन है पर उसकी 100तेली माँ ने उसे अभी तक बधार्इ भी नही दी। जब उसने स्कूल में अपने 2स्तों को यह बात बतार्इ तो वह उल्टे ही 100रभ के कान भरने लगे कि 100तेली माँ के आ4-वि4 अच्छे नही होते। वह हमेशा बच्चों में 2ष ही निकालती हैं और अत्या4 करती हैं। कर्इ बार तो उन्हें 6ड़ी से भी पीटती है। कर्इ बार तो बच्चे इतने ला4 हो जाते है कि घर से भागने की 9बत ही आ जाती है।

स्कूल की छुटटी के बाद वह सोचता हुआ जा रहा था कि 100तेली माँ से उसकी कभी अनबन भी नही हुर्इ पर आज उन्होनें बधार्इ क्यों नही दी। क्या वो भी उसे घर से निकाल देंगीं? लगता है, अब तो पिताजी भी उसे प्यार नही करते। 6तरी भी शायद इसीलिए नही लाकर दे रहे हैं। इसी सोच में उसे रास्ते में 1ता दीदी मिली। वो हमेशा वे2 के बारे में अच्छी-अच्छी बातें बताया करती थी। उन्होनें उसके घर का समा4 जाना और 2राहें पर से अपने घर चली गर्इ। वो 6मियाँ राम जी की 2ती थी। उसके और 100रभ के पिताजी बहुत अच्छे 2स्त थे। 1ता दीदी के पिताजी 9सेना में 9करी करते थे और 100रभ के पिता सवार्इ मानसिंह में रोगियों का उप4 करते।

यही सोचते-सोचते उसका घर आ गया और उसने ड़रते-ड़रते दरवाजे़ पर 10तक दी पर दरवाज़ें खुला था। कमरे में किसी की आहट ना पाकर वो चुपचाप अपने कमरे में चला गया। उसकी हैरानी की कोर्इ सीमा नही रही जब उसने अपनी 4पार्इ पर 100गात रखी देखी। 100गात खोलने पर उसमें सुन्दर सी 6तरी मिली। जैसे ही उसने पलट कर देखा तो उसकी माताजी और पिताजी जन्मदिन की बधार्इ ताली बजा कर दे रहे थे। उस समय तीनों की आँखें नम थी।

आज का दिन 100रभ के लिए ढ़ेरो खुशियाँ लेकर आया था। उसे अपनी माँ का प्यार मिला। माँ ने बताया कि शाम को तोहफा देकर चौंका देना चाहते थे। इसीलिए सुबह बधार्इ नही दी। अब उसके मन में कोर्इ शंका नही थी कि मम्मी पापा उसे बहुत प्यार करतें हैं। अपनी नर्इ 6तरी लेकर वो 2स्तों को दिखाने बाहर भागा। बाहर धूप निकल आर्इ थी और सुन्दर सा इन्द्रधनुष सुनहरी 6ठा बिखेर रहा था।

रोचक बाल कहानी 100रभ की छतरी

राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित हुई कहानी

आपको कैसी लगी … जरुर जरुर बताईगा :)

 

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14. एक पत्र चोर के नाम

एक पत्र चोर के नाम

बच्चे का पैगाम, चोर के नाम

समझ नहीं आ रहा कि तुम्हें किस नाम से सम्बोधन करूँ प्रिय, तो तुम हो ही नहीं सकते क्योंकि तुमनें घर में मेरे मम्मी-पापा और बूढ़े दादा-दादी को बहुत रूलाया है। अन्य कोर्इ आपत्त्तिजनक सम्बोधन मैं कर नहीं सकता क्योंकि मेरे परिवार से मुझे ऐसे संस्कार ही नहीं मिले। लेकिन एक बात तो तय है कि तुम बुरे हो…………बहुत बुरे हो।

child photoकल ही की तो बात है सुबह से हम कितने खुश थे। मुझे पता लगा था कि हमारे घर नन्हा-मुन्हा मेहमान आने वाला है। मम्मी भी कितनी प्यारी लग रही थी, भगवान जी के सामने हाथ जोड़कर वह कितनी देर तक लक्ष्मी माँ को निहार रही थी और सुबह से ना जाने कितनी बार मेरा माथा चूम रही थी। शाम को मैंने ही जिदद की थी कि हम होटल में खाना खाने जाऐंगे, मम्मी का भी चटपटी चीज खाने को मन था। अत: पापा भी दफ्तर से जल्दी छुटटी लेकर आ गए थे। वह सरकारी नौकरी में हैं, पहले मेरे दादू भी सरकारी नौकरी में थे पर रिटायर होने के पश्चात वह गाँव में रहने लगे। मम्मी की खुशखबरी सुनकर वह और दादी भी बधार्इ देने आए थे। अगले महीने मेरे चाचा की शादी होनी थी तो खूब खरीददारी भी चल रही थी। मैंने घोड़ी पर चाचा के साथ बैठना था इसलिए मेरी अचकन, पगड़ी और बहुत बड़ा मोतियों का हार लाए थे। मम्मी ने सब सम्भाल कर अपनी अलमारी में रखा हुआ था। माँ ने भी अपने पसन्द की सुन्दर साडि़यां खरीदी थी और पापा ने भी ढ़ेर सारी खरीददारी की थी।
चोर, तुम तो जानते ही हो, र्इमानदारी से सरकारी नौकरी करने वाले की आय क्या होती है। वैसे, मेरे पापा ने हमें किसी भी चीज़ की कभी तंगी नहीं होने दी। वह सिर ऊँचा करके चलते और कभी भी गलत बात सहन नही करते थे। अच्छा तो मैं बता रहा था कि शाम को होटल से खाना खाकर जब हम निकले तो सोचा अगर सिनेमा के टिकट मिल जाते हैं तो शो ही देख लेंगे। भाग्यवश कहो या दुर्भाग्य वश टिकट मिल गए और हम रात को बारह बजे घर पहुंचे।
पापा को घर पहुंचते ही कुछ गड़बड़ लगी। पापा लार्इट जला कर जेब से चाबी निकाल ही रहे थे कि दरवाजे का ताला टूटा पड़ा था। पापा स्वयं को संयत करके दादू का हाथ पकड़ कर घर के अन्दर दाखिल हुए तो घर खाली-खाली सा नजर आ रहा था। टी.वी., टेप-रिकार्डर  और दीवार घड़ी कहीं नजर नहीं आ रहे थे।
पूरे घर को इस तरह से उलट-पुलट कर रखा था मानों अभी-अभी भूचाल आया हो। मम्मी की अलमारी से सारे कपड़े जमीन पर बिखरे पड़े थे और उसमे रखा नकदी और जेवर सब गायब था। वैसे मुझे पता नहीं मम्मी के पास क्या-क्या था पर इतना पता है कि मम्मी एकदम सन्न होकर पलंग पर गिर पड़ी थी और पापा ने मुझे पानी लाने के लिए दौड़ाया।
रसोर्इघर के पास ही हमारा छोटा सा मंदिर है उस लक्ष्मी गणेशजी के मंदिर में रखा सारा चढ़ावा भी ले गए और हनुमान जी की गुल्लक को जमीन पर फैंक कर उसे तोड़ कर उनकी रोजगारी भी ले गए। मुझे परसों ही कक्षा में प्रथम आने पर सोने का तमगा (गोल्ड़ मैड़ल) मिला था जोकि मैंने गणेश जी की मूर्ति गिरा कर ले गए।
हर कमरे का ताला टूटा हुआ था। कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। पडोसी भी सब घर पर इकटठा हो रहे थे। सदा मुस्कुराने वाली मेरी मम्मी को देख कर मेरी आँखों से आँसू बहे ही जा रहे थे। मम्मी की नर्इ साडि़यां, मेरी शादी के लिए तैयार की गर्इ अचकन भी ले गए। हमारे ही घर का सामान, हमारी ही अटैची और बैग में भर-भर कर ले गए।
पता नहीं, तुम कितने लोग आए थे और क्यों आए थे। आखिर हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था। मुझे पता है कि पापा ने किस तरह रूपया-रूपया जोड़कर छोटा सा रंगीन  टेलिविज़न खरीदा था और मेरी मम्मी कालोनी के बच्चों को घर पर पढ़ाती ताकि मैं सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ संकू।
लेकिन आज मैं बहुत उदास बेबस और मायूस महसूस कर रहा हूँ और चोर, तुमको पत्र लिख रहा हूँ। पापा मेरे आँसू पोंछते हैं लेकिन खुद के दस-दस आंसू टपक जाते हैं, मुझे हिम्मत देते हैं और खुद………… कमजोर पड़ जाते हैं। अचानक मम्मी को रात ही को अस्पताल ले जाना पड़ा मुझे नहीं पता क्या बात है पर दादी ने बताया कि अचानक उनकी तबियत खराब हो गई अब वह कल वापिस घर आऐंगी। मुझे ज्यादा समझ तो नही पर इतना जरुर कह सकता हूं कि कोई न कोई बात मुझसे जरुर चिइपाई जा रही थी क्योकि अस्पताल से आने के बाद सभी दबी आवाज में कुछ बातें कर रहे थे.
घर में पुलिस भी आर्इ। उन्होंने हमारे बयान  भी लिखे पर सामान कब मिलेगा और मिलेगा या नहीं इसका किसी को नहीं पता। पर इतना पता है आज खुशी हमारे घर से दो सौ मील दूर भाग गर्इ हैं। मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि वह समय के साथ सब ठीक कर देगा और मेरी मम्मी भी अस्पताल से जल्दी ही वापिस आ जाएगी।
चोर, अगर जाने-अनजाने तुम मेरा यह लेख पढ़ रहे हो तो मैं तुम्हारे सामने आँसू भरी आँखें और हाथ जोड़ कर विनती करता हूँ कि प्लीज़, चोरी करना छोड़ दो। इस महंगार्इ के समय में हर आदमी तिनका-तिनका जोड़ कर अपना आशियाना बनाता है तुम उसे एक झटके में मत ले जाओ…….. मत ले जाओ…….. मत ले जाओ……..

एक बच्चे का चोर के नाम पैगाम आपको कैसा लगा ??? जरुर बताईएगा !!!

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15. बाल कहानी अहसास

बाल कहानी  अहसास

 writing on paper photo

 

प्रिय मम्मी, मुझे समझ नहीं आ रहा कि आपको क्या और कैसे लिखूं पर मुझे माफ कर दो। मेरी उन गलतियों की जोकि मैंने की और आपको तंग किया। आप आज अस्पताल में मेरी ही वजह से हैं, लेकिन सच मानो, मेरा न तो कोर्इ गन्दा दोस्त है और न ही मैं इंटरनेट या टी.वी. देखकर बिगड़ा हूं। मुझे खुद भी नहीं पता कि मैं ऐसा क्यों हो रहा हूं। वैसे तो मैंने बहुत गलतियां की हैं पर कुछ एक के लिए मैं ………………!आपको याद होगा कि एक दिन आपने मुझसे बार-बार पूछा था कि चुप-चुप क्यों हूं। असल में मैंने जानबूझ कर अनिल को बाल मारी थी। उसे आँख के नीचे सात टांके लगे थे। नोटिस मिला कि आपको बुलाया है तो मैंने झूठ-मूठ अपनी तरफ से ही लिख दिया कि मैं बीमार हूं इसलिए आ नहीं सकती। आपके सार्इन भी कर दिए थे। झूठ के हस्ताक्षर किये थे ना इसलिए डर रहा था कि सच्चार्इ पता लगेगी तो मैं फँस ही ना जाऊँ। एक बार जब आपने मेरी पसन्द का खाना नहीं बनाया तो मैं मुंह फुला कर अपने कमरे में चला गया था।

सन्नी लिख ही रहा था तभी दरवाजे की घंटी बजी। सन्नी ने फटाफट अपनी चिठ्ठी तकिए के नीचे छिपा दी और दरवाजा खोलने चला गया। बाहर सन्नी के दादा जी खड़े थे। वो अन्दर आ गए और बोले कि उसकी मम्मी को ग्लूकोज लग रहा है, ब्लड़ प्रेशर बहुत कम है। एक घण्टे में उसके पापा खिचड़ी लेने आएंगे। चाची बनाकर तैयार रखेगी। सभी ने हामी की मुद्रा में गर्दन हिला दी। चाची मम्मी की बीमारी के कारण कुछ दिनों के लिए यहां आर्इ हुर्इ हैं, पर चाची को अपने बेटे नमन के अलावा कोर्इ दिखता ही नहीं, सन्नी से तो वो सीधे मुंह बात ही नहीं करती। कल मैगी बनार्इ और चाकलेट केक बनाया तो सारा अकेले ही नमन ही खा गया। सन्नी सोच रहा था कि मम्मी होती तो उसका कितना ख्याल रखती। सन्नी ने दादाजी को बताया कि उसकी चाची अभी बाजार गर्इ हुर्इ है। आने वाली होगी।

दादाजी अपना न्यूज चैनल लगा कर बैठ गए। सारा घर कितना गंदा हो रहा था। उसकी मम्मी सारा दिन घर कितना साफ रखती थी। सन्नी अपनी बात मम्मी तक चिठ्ठी के माध्यम से पहुंचाना चाह रहा था। उसे डर लग रहा था कि वो जल्दी से चिठ्ठी लिखे, और वो उड़ कर उसकी मम्मी तक पहुंच जाए और मम्मी उसको माफ करके ठीक होकर जल्दी से घर आ जाए।
सन्नी की मम्मी सन्नी को बहुत प्यार करती थी। पर जबसे सन्नी आठंवी क्लास में आया है तभी से कुछ बदल गया है। सीधे मुंह बात नहीं करता, उलटे सीधे जवाब देता, मम्मी कोर्इ घर का काम कहती तो साफ मना कर देता। मम्मी ने कर्इ बार प्यार से तो कर्इ बार गुस्से से समझाया पर उसने कभी समझने की कोशिश नहीं की। लेकिन आज शायद मम्मी को अस्पताल तक ले जाने का दोषी शायद वो खुद ही है।
सन्नी जल्दी से चिठ्ठी लिख कर मम्मी तक पहुंचाना चाहता था। वो चाह रहा था कि जब अस्पताल में मम्मी के लिए खिचड़ी जाए तो वो चिठ्ठी भी चली जाए। उसकी चाची भी बाजार से आ गर्इ थी और बर्तनों की उठा-पटक तेज हो गर्इ।
सन्नी अपने कमरे में गया और तकिए के नीचे से चिठ्ठी निकाली ………….. कमरे में चला गया था। उसने आगे लिखना शुरू किया …………. मम्मी, आपने बहुत मनाया और रात को होटल से खाना मंगवाने का वायदा भी किया पर मैं मुँह बना कर ही पड़ा रहा और उसी शाम मैंने आपके पर्स से पाँच सौ रूपये चुरा लिए थे। आप तो मेरे ऊपर शक कर ही नहीं सकती थी और काम वाली बाई तुलसी को आपने काम से निकाल दिया। वो बेचारी रोती रही कि उसने चोरी नहीं की ……….। उसके बाद आपने दूसरी कामवाली भी नहीं रखी और मैंने भी आपको सच्चार्इ नहीं बतार्इ। एक बार संजय अंकल आए थे तो मैंने उनकी सिग्रेट भी पी थी पर थोड़ी सी।
जब आप हर रोज सुबह मुझे स्कूल जाने के लिए उठाती, मुझे दूध देती और मेरे बालों को सहलाती तो मुझे बड़ा गुस्सा आता कि क्या है, सुबह-सुबह मेरी नींद खराब कर देती हैं ……….. काश मम्मी की तबियत ही खराब हो जाए ताकि न मुझे दूध पीना पड़े और न ही स्कूल जाना पड़े। सारा दिन घर पर मजे से बैठ कर टी.वी. देखूं। पर मम्मी, सच, आज आपको अस्पताल गए चार दिन हो गए हैं। लेकिन मुझे ऐसा लग रहा है कि चालीस दिन हो गए हैं।

मम्मी, आपकी बहुत याद आ रही है अब प्लीज, घर आ जाओ। मेरी सारी गलतियों की सजा पिटार्इ करके दे दो। सन्नी के लिखे अक्षर धुंधले हो गए। पर वो जल्दी से चिठ्ठी लिखकर उसे मम्मी तक पहुंचाना चाह रहा था इसलिए उसने फटाफट आँसू पोंछे और लिखना जारी रखा।
मम्मी, मैं आपसे माफी मांगता हूं और वायदा करता हूं कि जितना प्यार से आप मुझसे बात करती हो उससे भी ज्यादा प्यार से रहूंगा आपका कहना मानूंगा और आपके हाथ से सुबह-सुबह दूध पी पीऊंगा। मम्मी पता है आज मैं मंदिर भी गया था वहां से चरणामृत पीकर आपकी तबियत की भगवान से विनती की कि हे भगवान जी, मेरी मम्मी को फटाफट ठीक कर दो।
तभी आवाज आर्इ कि उसकी चाची ने सारा सामान टोकरी में रख दिया है। सन्नी के पापा भी घर आ गए थे बोले कुछ तबियत ठीक है। उसने फटाफट कागज मोड़ कर उस पर ‘सिर्फ मम्मी के लिए लिख दिया और प्लेट के नीचे नैपकिन के ऊपर अपनी चिठ्ठी को धड़कते दिल से रख दिया। मम्मी का हँसता चेहरा बार-बार उसे नज़र आ रहा था।
पापा जल्दी में थे और चले गए। सन्नी डर रहा था। मम्मी पढ़ेगी तो क्या सोचेगी ……….. अगर उस चिठ्ठी को किसी और ने पढ़ लिया तो ……….!!
पर अब कुछ नहीं हो सकता था चिठ्ठी जा चुकी थी। सन्नी को खुद पर गुस्सा आने लगा कि उसने इतनी जल्दी में चिठ्ठी क्यों दे दी। ना नीचे ढ़ंग से अपना नाम लिखा। बिना खाना खाए अपना कमरा ठीक करके वो चुपचाप सो गया। चाची एक बार उससे खाने का पूछने आर्इ लेकिन उसके मना करने पर उन्होंने दुबारा उससे पूछा नहीं। बस, अब सन्नी मन ही मन चाह रहा था कि मम्मी जल्दी घर आ जाए …………. तो वो कभी भी मम्मी को तंग नहीं करेगा। उधर उसे चिठ्ठी का भी डर लग रहा था कि मम्मी उसके बारे में क्या सोचेंगी। वो मन ही मन चाहने लगा कि मम्मी वो कागज देखे ही नहीं और खाना वापिस आने पर वो उस चिठ्ठी को फाड़ कर फैंक देगा। और हमेश के लिए अच्छा बच्चा बन जाएगा। यह बात भी बिल्कुल सच है कि उसकी मम्मी बहुत प्यार करती थी और जब वो बतमीजी से बोलता, कहना नहीं मानता तो वो उसकी बातें दिल से लगा लेती उधर से काम वाली बार्इ के जाने के बाद वो सारा काम खुद करने लगी। टैन्शन और काम के बोझ से अचानक उनकी तबियत बिगड़ गर्इ और अस्पताल में दाखिल करवाना पड़ा। आज सन्नी को महसूस हो रहा था कि वो मम्मी के बिना  कुछ भी नहीं। पापा तो काम में ही व्यस्त रहते हैं और दादी-दादा गाँव में रहते हैं चाची-चाचा दूसरे शहर में रहते हैं।
यहीं सोचते-सोचते वो सो गया। शाम को आँख खुली तो पापा की आवाज आ रही थी कि अस्पताल में उन्होंने खाना नहीं खाया। पर तबियत बेहतर है शायद कल घर ही आ जाए। सन्नी उठ कर बाहर भागा। उसने टोकरी में देखा तो चिठ्ठी वैसी ही रखी मिल गर्इ शायद किसी ने पढ़ी ही नहीं थी। सन्नी ने फटाफट टोकरी से वो चिठ्ठी निकाल कर उसे अपनी अलमारी में छिपा दिया। सोच कि समय मिलने पर फैंक दूंगा।
मम्मी कल घर आ जाएगी तो आज घर का माहौल कुछ हलका था। सन्नी सभी से बात कर रहा था और चाची के साथ घर की सफार्इ भी करवा रहा था। उसमें एक नया जोश भरा था।
बड़ी मुशिकल से दिन बीता। दोपहर को मम्मी घर आ गए। वो बहुत कमजोर लग रही थीं। सन्नी ने मम्मी को फल काट कर दिए। शाम को मम्मी के पास ही लेटा रहा था। एक-दो दिन में चाची और दादा जी भी चले गए थे। मौका मिलते ही उसने वो चिठठी भी फाड़ कर फैंक दी थी। मम्मी अब काफी ठीक होने लगी थी।

पर एक बात सन्नी को कभी पता नहीं लगेंगी कि उस दिन मम्मी ने उसकी चिठ्ठी पढ़ ली थी लेकिन सन्नी को महसूस तक नहीं होने दिया ताकि उसे दुख न हो कि उनके बेटे ने कितने गलत काम किए हैं। पर अब उसने गलती सुधार ली है और वायदा किया है तो उनके लिए यही बहुत था। उस दिन अस्पताल में चिठ्ठी पढ़ने के बाद उनसे खाना नहीं खाया गया और सन्नी की बाल सुलभ भावनाओं को समझते हुए चिठ्ठी उसकी जगह पर रखकर उन्होंने वापिस भिजवा दी थी। घर में ये बात किसी को भी पता नहीं चली।
अब सब ठीक है। सन्नी अच्छा बच्चा बन गया है। मम्मी का कहना मानता है और स्कूल में किसी से झगड़ा नहीं करता। सन्नी खुश है कि मम्मी ने उसकी चिठ्ठी नहीं पढ़ी और मम्मी खुश है कि सन्नी ने चिठ्ठी में अपनी सारी गलितयों को मानकर माफी माँग ली है और अब वो सुधर रहा है। तुलसी ने भी काम पर आना दुबारा से शुरू कर दिया। सन्नी ही उसे लेकर आया। मम्मी के पूछने पर सन्नी ने बताया कि जब आपकी तबियत बिल्कुल ठीक हो जाएगी तब दुबारा हटा देना। मम्मी ने सब जानते-बूझते उससे कुछ नहीं कहा और मेरा अच्छा बेटा कहकर उसे बाँहों में ले लिया।

कहानी आपको कैसी लगी… आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार है :-)

 

 

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16. प्रसन्न हुए भगवान

प्रसन्न हुए भगवान

 

गाँव में साधु बाबा पधारे हुए थे। उन्होंने गाँव वालों के मन में यह बात ड़ाल दी थी कि मुझे भगवान ने भेजा है। वह तुम सभी से नाराज है। इसका प्रमाण भी दिखाया कि जब वह पूजा के लिए कच्चा दूध रखतें हैं तो वह स्वयं उबलने लगता है।भोले-भाले गाँव वाले उनकी बातों में आ गए। बाबा की तो चांदी हो गर्इ। वह दोनों हाथों से धन लेने लगे बहुत से लोग बाबा की सेवा भी करने लगे किसलिए? अरे भार्इ। भगवान का गुस्सा कम करने के लिए दान, दक्षिणा और सेवा का काम जरूरी था।

समय बीतता रहा। लेकिन हर रोज कच्चे दूध में उबाल आता रहा और बाबा कहते भगवान अब भी नाराज है, दान बढ़ाओ। बहुत दिन बीते बाबा वहाँ से जाने की सोचने लगे कि  रूपया खूब इक्ठ्ठा  हो गया अब खिसका जाए बहुत बुद्धु बना लिया यहाँ के लोगों को।

एक दिन बाबा के यहाँ झाड़ू-बुहारी करने वाले चंदू ने सफार्इ के दौरान एक थैले में ढ़ेर सारा चूना देखा। उस नासमझ ने सोचा शायद कोर्इ गलती से यहाँ रख गया होगा। भला चूने की डलियां बाबा के किस काम की। यह सोच कर वह दीवारों पर पुतार्इ करने के लिए उसने तुरन्त वो चूना भिगो दिया। पर यह क्या ? पानी में से तो बुलबुले उठने लगे। पहले तो उसने सोचा कि वह भगवान की ही नाराजगी है पर बाद में उसने सोचा कि चूना गरम होता है बुलबुले या भाप तो उठेगी ही।

अब चन्दू को बाबा की पोल समझ आ रही थी। वह समझ गया था कि चूना, बाबा ने अपनी कुटिया में क्यों रखा ? उसने असल में कुछ चीजें ताप या उष्मा क्रियाए करती है। कुछ उष्मा शोषी होती हैं। जिस कारण पानी के संयोग से ठंडी हो जाती हैं। जबकि पानी के संयोग से ठंडी हो जाती हैं। जबकि चूना उष्माक्षेपी है वह पानी के संयोग कर उष्मा देता है। चूने की डलिया पानी में डालने पर भाप निकलना इसका उदाहरण है। अब रही बात दूध उबलने की तो उस दूध में उपसिथत पानी से कि्रया कर उष्मा निकालता है और दूध उबलता हुआ प्रतीत होता है।

हर शाम की तरह इस शाम को भी बाबा की कुटिया के आगे भारी भीड़ जमा होने लगी यह जानने के लिए कि भगवान अभी प्रसन्न हुए या नाराज ही चल रहे हैं। पूजा का समय हो चला था, बाबा ने पूरी कुटिया छान मारी पर उन्हें कही चूना ही नहीं मिल रहा था। उन्होंने सोचा कि आज मैं गांव वालों को कच्चे दूध से ही पूजा करवा देता हूँ, कह दूँगा भगवान खुश हो गए और मैं यहाँ से किसी दूसरे गाँव चला जाऊँगा। पर लालच का क्या करते ? बाबा ने सोचा यहाँ तो इतना पैसा, सोना, चांदी मिल रहा है। दूसरे गाँव में मिले ना मिले। वह सोच ही रहे थे तभी उन्हें बाहर से कुछ आवाजें आती सुनार्इ दी। वो बाहर आए तो चंदू लोगों को कुछ बताकर पूजा करवा रहा था। उसने गाँव वालों को बतालाया कि किस तरह बाबा हमारी आंखों में धूल झोंक कर कच्चे पानी मिले दूध में चूने की ड़लियां ड़ालते रहे। और हमें यह कुछ ही देर में उबलता हुआ दिखने लगता।
पोल खुल चुकी थी। चारों तरफ से बाबा घिर चुके थे। मरता क्या न करता उन्होंने अपनी गलती मान ली और मुझे पुलिस के हवाले ना किया जाए यह हाथ जोड़कर निवेदन करने लगे। गाँव वालों को दया आ गर्इ।
गाँव वालों ने सारा पैसा, सोना, चाँदी, जवाहरात लौटा देने पर बाबाा को माफी दे दी और उसे गाँव से निकाल दिया गया। आखिर कुछ गलती तो उनकी भी थी। इस तरह अंधविश्वास में जीना भी तो गलत है।

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17. नारियल का फैसला

नारियल का फैसला ( बाल कहानी)

आज दोपहर ही गांव से दादी अम्मा का तार आया है। उसमें लिखा था कि दादी बीमार है, तुरन्त चले आओ. तार पढ़ने के बाद मनोज के पापा का मन दफ्तर में नहीं लगा। वह तुरन्त ही दो-तीन दिन की छुट्टी लेकर मनोज और अपनी पत्नी मनीषा के साथ गांव रवाना हो गए। रास्ते भर वह सोचते रहे कि अम्मा को शहर ले आएंगे। यहीं उनका इलाज करवाएंगे। तीन घंटे में वह गांव पहुंच गए।

वहाँ अड़ोसी-पड़ोसी इकटठे हुए थे। गांव की यही बात अच्छी है कि एक-दूसरे का सब बेहद ख्याल रखतें हैं। दादी के घर पहुंचे तो देखा, दादी बैठी हुर्इ थी। वह बहुत ही परेशान दिख रही थी। पापा ने उन्हें हाथ लगा कर देखा पर वह गर्म नहीं था।

मनोज के पापा ने राहत की साँस ली। दादी अम्मा के पड़ोसी छाछ ले आए। थोड़ा रूक कर मनोज के पापा ने पूछा, अम्मा बुखार कब उतरा?  अम्मा बोली बुखार तो था ही नहीं। पर अब चढ़ेगा। मनोज के पिता हैरान रह गए। लेकिन वो तार भिजवाया था आपने ? पापा बोले। हाँ, भिजवाया तो था, तुझे जो बुलवाना था। इसलिए भिजवाना पड़ा। अम्मा रूआंसी होकर बोली। मनोज के साथ-साथ उसके मम्मी-पापा को दाल में कुछ काला लगा। उन्होंने पूछा, भर्इ, बताएं ना आखिर क्या बात है?

तभी गांव के सरपंच दीनू काका बोले, बेटे बात ये है कि हमारे गांव में एक साधु महाराज पधारे हैं और अम्मा भी उनके दर्शनों के लिए गर्इ थी। अब बात यह है कि किस व्यक्ति का  और किसके परिवार का भविष्य उज्ज्वल होता है ? यह सब बाबा एक नारियल देकर ज्ञात कर लेते हैं। क्या नारियल से?

मनोज के मम्मी-पापा ने उत्सुकता से पूछा। मनोज की मम्मी को भी ऐसे जादुर्इ बाबा के किस्से बहुत अच्छे लगते थे। तब दीनू काका ने बताया कि, बाबा एक नारियल लेने को कहते हैं। वहां बहुत से नारियल रखे होते हैं। जिस नारियल को हम हाथ लगाते हैं, बाबा उसे खोलते हैं। अब अगर उसमें से फूल निकले तो उसका तथा  उसके परिवार का जीवन खुशहाल रहता हैपर जिस नारियल में आग लग जाती है, उसके परिवार का नाश हो जाता है। बस, अम्मा तीन बार से बाबा के पास नारियल दिखवाने जा रही है और हर बार नारियल में आग निकल रही है। अम्मा को वहम हो गया कि उनके परिवार पर जरूर मुसीबतें आने वाली हैं। इसलिए उन्होंने आप सभी को तार देकर बुलवाया है।

मनोज की मम्मी को चिंतित हो गर्इ पर मनोज समझदार बालक था। वह जिस विधालय में पढ़ता था, वहां उनको यह शिक्षा भी दी जाती थी कि ढ़ोंगी साधु कैसे भोली-भाली जनता को लूटते हैं, उसे पता था कि उस बाबा ने क्या पाखंड किया होगा।

अगले दिन मनोज और उसके मम्मी-पापा तथा दादी सब उसी दरबार में गए। मनोज ने कहा, इस बार नारियल वो ही उठाएगा। बाबा के दरबार में खूब भीड़ थी। गांव वाले बाबा पर खूब चढ़ावा चढ़ा रहे थे। चारों तरफ जबर्दस्त धूप की खुशबू फैली हुर्इ थी। मनोज अपने साथ एक नारियल लेकर गया और बाबा से बोला, बाबा मेरा भविष्य बताइए। बाबा ने उसे ड़ांटा, मूर्ख, तू हमारा अपमान करता है, सिर्फ हमारे द्वारा रखे नारियल से ही भविष्य बताया जाएगा क्योंकि ये पूजा किए गए नारियल हैं। तब उसने अपना नारियल अपने पापा को दे दिया और बाबा द्वारा रखे नारियल में से एक नारियल उठा लिया। मनोज नारियल उठाते ही उसे सूंघने लगा।

अब बाबा कुछ सकपकाए। बोले, मूर्ख, नारियल क्यों सूंघता है? मनोज बोला, बाबा मैं परिवार की सुख-समृद्धि वाला नारियल चाहता हूँ। इसलिए आपको ऐसा ही नारियल सूंघ कर दूंगा, जिसमें हमारे परिवार का कल्याण हो। भीड़ के सभी लोग सकते में आ गए। पूरी भीड़ में खामोशी सी छा गर्इ। बाबा भी कुछ परेशान हो गए। मनोज ने एक नारियल हाथ में लिया और बोला , बाबा, आप इसे खोलें , इसमें अवश्य ही फूल होंगें। बाबा ने उसे हाथ में लेकर पानी के कुछ छींटे देकर उसे पवित्र कर कुछ मंत्र पढ़े और जब उसे खोला तो उसमें फूल निकले। क्यों, दादी माँ, अब तो कोर्इ बीमार नही पड़ेगा, देखो, अब फूल निकला है नारियल में।

बाबा को पोल खुलती नज़र आर्इ। उन्होंने शिष्यों से कहा कि आज उनकी तबियत ठीक नहीं है। अब वह दरबार कल सुबह लगाएंगे। लेकिन अब पासा पलट चुका था। बाबा को स्टेज पर जबर्दस्ती रोककर मनोज ने बताना शुरू कर किया, आमतौर पर साबुत नारियल के सिर पर तीन काली बिन्दी बनी होती है। बस थोड़ी सी सावधानी से, इसमें से एक बिन्दी में छेद करके छोटी सी फूलों की 2या 3 कलियां नारियल में ड़ाल दी जाती हैं। करीब सात घण्टे पहले ही और फिर छेद को आराम से बंद कर दिया जाता है। ये तो बात रही कि नारियल में फूलों के निकलने की। अब बात बची है नारियल में आग लगने की। तो होता यूं है कि नारियल के बालों या जटाओं में सोडियम के बहुत ही छोटे छोटे टुकड़े जो तेल से भिगो कर निकाले जाते हैंं। उन्हें इसमें छिपा कर रख देतें है और जब आप लोग नारियल चुन कर देतें हैं तो बाबा, उसमें जल छिड़क कर उसे शु़द्ध करते हैं, जो कि एक बहाना ही है। असल में,  होता यह है कि केरोसिन युक्त सोडियम धातु पर पानी डलते ही वह जलने लगती है। बस, बाबा कह देते हैं कि परिवार पर कष्ट आएगा और वो भोली-भाली जनता से धन, गहने, जमीन आदि खूब ऐंठते हैं। क्यों बाबा, मैंने सब ठीक कहा ना। अगर कुछ भूल गया हूँ तो बता देंं।

मनोज ने अपनी बात पूरी की। बाबा सिर झुकाए बैठे रहे। उनकी पोल खुल चुकी थी। अब उनके पास सारे गहने, रूपया, जमीन आदि वापिस करने के अलावा कोर्इ दूसरा रास्ता नहीं था। चारों तरफ मनोज की जय-जयकार होने लगी। दादी तो एकदम हक्की-बक्की सी बैठी ही रह गर्इ। वो बहुत खुश हुर्इ कि ढ़ोंगी को सबक मिल गया।

नारियल का फैसला

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18. नई मां

आज मेरी सहेली मणि ने एक ऐसी कहानी सुनाई कि जिसे सुनकर मैं निशब्द रह गई.
उसने नई मां कहानी कही पढी थी. कहानी कुछ ऐसे है

एक आदमी ने अपनी पत्नी के मरने के बाद दूसरी शादी की और अपने 5 साल के बेटे से पूछा कि उसे अपनी नई मां कैसी लगी. इस पर बेटा मासूमियत से बोला कि मेरी मां झूठी थी पर नई मां सच्ची है इस पर पिता हैरान हो गए और पूछा कि वो ऐसे कैसे कह सकता है इस पर बेटा बोला जब मैं शरारत करता था तो मां नाराज होकर कहती थी कि ठहर जा… तुझे तो मैं खाना ही नही दूंगी पर थोडी ही देर मे लाड प्यार करके पुचकार के गोद मे बैठा कर खाना खिलाती थी.

नई मां भी यही कहती है कई बार नाराज होकर कहती है कि तुझे खाना नही दूगी पर वो सच्ची है वो वाकई मे खाना नही देती “आज दो दिन हो गए मुझे खाना खाए” !!!!

( वैसे कहानियों का भी अलग ही संसार होता है कुछ कहानियां हसांती हैं गुदगुदाती है वही कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो कुछ सोचने पर मजबूर ही कर देती हैं. नई मां कहानी कुछ ऐसी की कहानी है …)

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19. new beginnings and searching for stories ~ parts three and four

muse-three
muse-four


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20. WRITE YOUR STORY…WITH FIRST LINE.

2015 marks the 17th year of The First Line.  This online publication gives writers an opportunity to see one of their stories in print using the format of the same first line.

Here are the new first lines for 2015.

Spring 2015: Fairy tales hardly ever come true for quiet girls.   (Submissions due February 1, 2015.)

Summer 2015: Laura liked to think she was honest with herself; it was everyone else she lied to.   (Submissions due May 1, 2015.)

 Fall 2015: The old neighborhood was nearly unrecognizable.   (Submissions due August 1, 2015.)

 Winter 2015: George pressed the call button and said, “Mrs. Whitfield, you have a visitor.”(Submissions due November 1, 2015.)

The First Line is available on Kindle: http://www.amazon.com/gp/product/B006XGLLSU


1 Comments on WRITE YOUR STORY…WITH FIRST LINE., last added: 12/8/2014
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21. Michael Meade on stories

0 Comments on Michael Meade on stories as of 12/11/2014 11:24:00 AM
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22. Merry Christmas from Portsong

Merry Christmas from our little Southern town.

Since we are fictional, I am happy to report that we have a foot of lovely snow and every resident is at home in front of a warm fire. All businesses are closed and since the crime rate is zero, even Sheriff Whittaker has the day off. Every belly is full and every heart is warm with the glow of the season.

Although he netted more than the coal he deserved, Virgil Creech is still dissatisfied with his Christmas morning haul and has vowed to reform. Yes, he intends to be good for the next 365 days in the hopes of earning Santa’s favor for next year. It has only been two hours, but as always, there is promise in the lad.

Faith, hope, and love are the order of the day. Kindness, hospitality, gentleness and understanding reign. And for this moment, there is peace on earth.

Oh, that we would work to make this our reality.

Merry Christmas and God Bless,

The Mayor

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Filed under: Stories

5 Comments on Merry Christmas from Portsong, last added: 12/26/2014
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23. read all about it

 My brand new zine is hot of the press and on sale. This cut out and put together tiny little newspaper is for sale HERE.

0 Comments on read all about it as of 2/13/2015 10:35:00 PM
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24. काकी कहे कहानी

monica gupta-NBT- book3 dec. 2012 …. प्रगति मैदान मे विश्व पुस्तक मेले के दौरान नेशनल बुक ट्र्स्ट मे मेरी किताब “काकी कहे कहानी” होर्डिंग पर .एक लेखक के लिए इससे ज्यादा खुशी का मौका और क्या हो सकता है :) :)

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25. Home Sweet Home

कामना न्यूयार्क एयरपोर्ट पहुची. आज वो अपने होम स्वीट होम यानि भारत आ रही थी. कुछ खाली समय था तो टहलने लगी. जेब मे हाथ डाला तो दो चार फालतू के कागज थे. फेकने लगी तो को कोई कूडादान नही दिखाई दिया.उसने उसे वापिस जेब मे डाल लिया.समय बीता. कुछ ही देर मे उसका जहाज नई दिल्ली पहुच गया था. अपने सामान का इंतजार करते करते उसका हाथ फिर अपनी जेब मे गया. वही बेकार कागज पडे थे. उसने तुरंत उसे जमीन पर फेक दिया. इतना ही नही पर्स मे भी कुछ फालतू का छोटा मोटा सामान पडा था. वो भी उसने ऐसे ही जमीन पर फेक दिया. अब वो अपने “होम स्वीट होम” मे जो आ चुकी थी

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