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26. How Far in Advance Do Schools Book Author Visits?

Authors interested in doing school visits often wonder when the should contact schools to cultivate bookings. The answer is: as far in advance as possible.

Many – if not most – schools plan their budgets and schedules anywhere from six months to a year ahead. So if you’re interested in getting booked in the 2015-2016 calendar year, the time to begin cultivating those bookings is NOW.

Here in the western hemisphere, summer is halfway over (sorry!) and teachers and administrators will be heading back to their offices shortly to begin gearing up for the new school year. This is the moment to begin getting your ducks in a row! Make lists of schools to reach out to, prepare your author visit packet and plan the presentations you will offer.

With time on your side, you can be connecting with your audience and supplementing your author income this very next school year!

Want more information on doing school visits?

Click here to receive my FREE 3-PART VIDEO TRAINING SERIES on school author visits.

(Act fast… the videos expire on July 14th!)

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27. Green Valentine Launch!




6 August, 6pm.

Readings Bookshop, 309 Lygon Street, Carlton, Victoria, Australia 3053

Buy the book! Get it signed!

I’ll give you a free herb or veggie seedling!

No RSVP necessary, but you can on fbook if you really want to.

Official publication page.

Preorder now!


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28. Free Video Training Series on School Visits

Group of Elementary Pupils In ClassroomFor those of you who write children’s books and are interested in school visits, here’s some great news!

I ran a survey several months ago asking you to tell me your biggest question (or fear) about school visits. So many of you responded and shared your concerns and questions, that I’ve decided to provide a FREE Video Training Series that will answer your most burning questions.

The topics will be:

VIDEO #1: 10 Tips for a Successful School Visit (these ten tips will provide you with a solid foundation for doing school visits)

VIDEO #2: Things That Can (and Do) Go Wrong – and How to Deal With Them (we’re always afraid of the unknown, with this video I’m looking to make you more prepared!)

VIDEO #3: Answers to Your Top 10 Most Frequently Asked Questions (certain questions came up in your submissions again and again – I will answer these critical questions in order to make you feel more confident going into the classroom.)

Click here to sign up for the free training…. but do it quickly. The videos expire on July 14th! Once you sign up, you will soon receive an email giving you access to the first video!

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29. Increase vs decrease

  graph photo

Increase vs decrease

जनसंख्या लगातार बढ रही है. महंगाई का तो कोई हिसाब ही नही बेरोजगारी ,भ्रष्टाचार,प्रदूषण, पेट्रोल, राशन आदि की तो बात ही मत करो . हाल बेहाल है. क्या इनसे कभी छुटकारा मिलेगा.  क्या हमारे सामने कभी कमी भी आएगी या कमी का नाम भी इतिहास हो जाएगा    क्या इनसे कभी छुटकारा मिलेगा…..

अगर आप ऐसा ही कुछ सोच रहे हैं तो परेशान होने की कोई जरुरत नही है क्योकि आज के समय मे बहुत सी चीजो मे कमी या गिरावट आई है और तो और कुछ चीजे तो इतनी सस्ती हो गई है कि उनका कोई मोल ही नही रहा और आप हैं कि राग अलापे जा रहे हैं.



सुनिए हमारी जान(जिंदगी) सस्ती हो गई है इसकी कोई कीमत नही रही.

जीवन के मूल्य गिर गए है.

आँखो का पानी खत्म होता जा रहा है.

विश्वास की नीव कमजोर हो गई है.

सहनशक्ति कम हो गई है.

जंगल खत्म हो गए हैं हरियाली मे भारी कमी आई है.पक्षियो की चहचाहट कम हो गई है.

चीनी मे मिठास कम हो गई है.

बिजली की सप्लाई कम हो गई है.

स्कूलो मे टीचर और अस्पतालो मे डाक्टरो की कमी हो गई है.

खाने मे पोषक तत्वो की कमी हो गई है.

लडकियो मे खून की कमी हो गई है.जागरुकता, इज्जत, आदर मान ना के बराबर रह गए है और भी बहुत उदाहरण है इसलिए यह मत कहिए कि आज के समय मे कमी की कमी हो गई …..


कैसा लगा आपको ये Increase vs decrease लेख जरुर बताईगा :)  )

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30. मैं खिलाडी

मैं खिलाडी

             क्या परिचय दिया आपने अपने बारे मे ? क्या? आप खिलाडी हैं. ओह अच्छा अच्छा … कौन सा खेल खेलते हैं आप… अरे आप तो मेरी बात सुनकर हंसने लगे … बताईए न कौन सा खेल खेलते हैं आप ?? जी क्या कहां ???

आप राजनीति के मैदान के खिलाडी हैं. जनता को कितना भड्काना है आरक्षण का मुद्दा कितना,कब, कहाँ, कैसे उठाना है. कहाँ बसो, ट्रेनो को आग लगानी है. इसके खिलाडी तो नही है   आप ? ओह अच्छा अच्छा इसके साथ साथ   मैच फिक्सिंग के मैदान के खिलाडी हैं कि कब कहाँ कितना और किसको देना लेना है. किसको स्टिंग आपरेशन मे फसंवाना है या किसे बाहर निकालना है. इसके भी परफेक्ट खिलाडी हैं और इसी के साथ साथ  आप यकीनन देश की भोली भाली जनता को विदेश भेजने के नाम पर लाखो रुपये गटकने वाले खिलाडी  भी होग़ें. है ना. जोकि लालच दिखा कर धोखे से रुपए ऐंठ कर फरार हो जाते हैं.क्यो जनाब!!! कितने रुपये गटके आपने? कुछ बताईए ना …

असल में, हमारे देश मे खिलाडियो की कमी नही है यहाँ किस्म किस्म के खिलाडी है… वैसे आप खिलाडी तो नही होंगें .. क्या कहां … आप खिलाडी हैं … कौन से खेल के … :)

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31. Take Care

Take Care

Pic by Monica Gupta

अभी कुछ देर पहले मणि मेरे घर खीर ले कर आई … अरे वाह खीर !!!! किस खुशी में … वो बोली कि जब पिछ्ले दिनों वो छुट्टियों में बाहर चले गए थे तो पौधे सूख गए थे. एक को तो बचा नही पाई थी पर एक पौधे को उसने बचा लिया. उसकी खूब देखभाल की सुबह दोपहर शाम पानी दिया और आज सुबह उसमे फूल खिला है. उसी खुशी में खीर … मैने उसकी आखों मे झिलमिलाती खुशी देखी.

सच, हम अक्सर पौधो के मामले मे सुस्त हो जाते हैं अगर उन्हे लगाया है तो पानी देना तपती गर्मी से बचाना भी हमारा ही फर्ज है. घर की सुंदरता बढाने के साथ साथ वो हमारे अच्छे दोस्त भी है. अगर आप भी बचा सकते हैं तो किसी को मुरझाने से बचा लिजिए… Take Care of plants …

पर्यावरण को सुरक्षित रखने के बहुत लोग अपने अपने तरीके से संदेश देते हैं … कोई टीवी पर, कोई नाटिका के माध्यम से तो कोई गीत गाकर तो कोई समाचार पत्र मे माध्यम से जनता को प्रेरित करते हैं …

दैनिक भास्कर ने भी एक अभियान छेडा

बरसात के इस मौसम में अपने नाम का पौधा लगाएं।

औषधीय पौधा लगाएंगे तो और भी उत्तम होगा।

एक पौधा हमारे लिए माध्यम बनेगा, अपने बचपन को फिर से जीने का।

मा नसून ने दस्तक दे दी है। फिलहाल इसने तेजी नहीं पकड़ी है। मगर पूरी उम्मीद है कि कुछ देर से ही सही, घटाएं जमकर बरसेंगी।

हर वर्ष की तरह, इस बार भी दैनिक भास्कर समूह अपने करोड़ों पाठक परिवारों के साथ मिलकर आज से पौधरोपण अभियान की शुरुआत कर रहा है। यही तो सही समय है, जब हमारे द्वारा लगाए गए पौधे धरती की गोद में आसानी से पल-बढ़ सकते हैं।

आइए, आज हम एक नई परंपरा की शुरुआत भी करते हैं। बरसात के इस मौसम में हम अपने नाम का एक पौधा लगाते हैं। और फिर उसकी देखभाल उतने ही प्यार से करें, जैसी हमारे बड़े हमारी करते थे। यकीन मानिए, जब हम रोज सुबह अपने नाम के इस पौधे को देखेंगे तो हमारे चेहरे पर कुछ वैसी ही मासूम मुस्कुराहट होगी, जैसी बचपन में हुआ करती थी। वह पौधा हमारे लिए माध्यम बनेगा, अपने बचपन को फिर से जीने का।

ऐसा हम अपने परिवार के सभी सदस्यों के लिए करें। परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने नाम का एक पौधा लगाए। यदि भास्कर के करोड़ों पाठक अपने नाम का एक पौधा लगाएं और उसकी देखभाल करें, तो हम पर्यावरण को हराभरा करेंगे ही, आने वाली पीढ़ियों को अपने नाम की अनमोल विरासत भी देंगे।



Via bhaskar.com

Take Care

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32. सादर चरण स्पर्श



bow his head photo

सादर चरण स्पर्श

आज घर पर एक मित्र आए . उनके छोटे  से बच्चे ने बहुत शालीनता से झुक कर पैर छुए. सच जानिए बहुत अच्छा लगा. बच्चों में इस तरह के संस्कार जरुर देने चाहिए. पुराने ऐतिहासिक धारावाहिकों में भी अक्सर  ये देखने को मिल जाता है. कुछ लोग पाव छूने पर आशीर्वाद देते हैं और पीठ थपथपाते हैं तो कुछ रोक लेते हैं कि अरे नही नही … हम इतने बडे अभी नही हुए हैं.. वैसे मेरी एक जानकार थी वो पैर छूने पर बस मुहं से ही बोलती थी खुश रहो पर सिर पर हाथ नही रखती थी … बाद मे महसूस किया कि वो कभी भी किसी को सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद नही देती थी पर दूर से ही खुश रहो बोल देती थी. वैसे पहले समय की अगर बात करें तो कई लोग जब अपने से बडे को पत्र लिखते थे तो वो शुरुआत ही सादर चरण स्पर्श से करते थे.
हिंदू परंपराओं में से एक परंपरा है सभी उम्र में बड़े लोगों के पैर छुए जाते हैं। इसे बड़े लोगों का सम्मान करना समझा जाता है. उम्र में बड़े लोगों के पैर छूने की परंपरा काफी प्राचीन काल से ही चली आ रही है। इससे आदर-सम्मान और प्रेम के भाव उत्पन्न होते हैं। साथ ही रिश्तों में प्रेम और विश्वास भी बढ़ता है। पैर छूने के पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक कारण दोनों ही मौजूद हैं।
जब भी कोई आपके पैर छुए तो सामान्यत: आशीर्वाद और शुभकामनाएं तो देना ही चाहिए, साथ भगवान का नाम भी लेना चाहिए। जब भी कोई आपके पैर छूता है तो इससे आपको दोष भी लगता है। इस दोष से मुक्ति के लिए भगवान
का नाम लेना चाहिए। भगवान का नाम लेने से पैर छूने वाले व्यक्ति को भी सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं और आपके पुण्यों में बढ़ोतरी होती है।
आशीर्वाद देने से पैर छूने वाले व्यक्ति की समस्याएं समाप्त होती है, उम्र भी बढ़ती है।
किसी बड़े के पैर क्यों छुना चाहिए:-
पैर छुना या प्रणाम करना, केवल एक परंपरा या बंधन नहीं है। यह एक विज्ञान है
जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ा है। पैर छूने से केवल बड़ों का आशीर्वाद ही नहीं मिलता बल्कि अनजाने ही कई बातें हमार अंदर उतर जाती है।

पैर छूने का सबसे बड़ा फायदा शारीरिक कसरत होती है, तीन तरह
से पैर छुए जाते हैं। पहले झुककर पैर छूना, दूसरा घुटने के बल बैठकर तथा तीसरा साष्टांग प्रणाम। झुककर पैर छूने से
कमर और रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है। दूसरी विधि में हमारे सारे जोड़ों को मोड़ा जाता है, जिससे उनमें होने वाले
स्ट्रेस से राहत मिलती है, तीसरी विधि में सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए तन जाते हैं, इससे भी स्ट्रेस दूर होता है। इसके
अलावा झुकने से सिर में रक्त प्रवाह बढ़ता है, जो स्वास्थ्य और आंखों के लिए लाभप्रद होता है। प्रणाम करने का तीसरा सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे हमारा अहंकार कम होता है। किसी के पैर छूना यानी उसके
प्रति समर्पण भाव जगाना, जब मन में समर्पण का भाव आता है तो अहंकार स्वत: ही खत्म
होता है।



Rajasthan Patrika:secret of feet touching sanskar

जयपुर चरण स्पर्श व चरण वंदना को भारतीय संस्कृति में सभ्यता और सदाचार का प्रतीक माना जाता है। आत्मसमर्पण का यह भाव व्यक्ति आस्था और श्रद्धा से प्रकट करता है। यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो चरण स्पर्श की यह क्रिया व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक रूप से पुष्ट करती है। यही कारण है कि गुरुओं, (अपने से वरिष्ठ) ब्राह्मणों और संत पुरुषों के अंगूठे की पूजन परिपाटी प्राचीनकाल से चली आ रही है। इसी परंपरा का अनुसरण करते हुए परवर्ती मंदिर मार्गी जैन धर्मावलंबियों में मूर्ति पूजा का यह विधान दक्षिण पैर के अंगूठे की पूजा से आरंभ करते हैं और वहां से चंदन लगाते हुए देव प्रतिमा के मस्तक तक पहुंचते हैं।पुराण और चरण वंदनापुराण कथाओं में गुरुजन और ब्राह्मणों की चरण रज की महिमा में कहा गया है -यत्फलं कपिलादाने, कीर्तिक्यां ज्येष्ठ पुष्करे।तत्फलं पाण्डवश्रेष्ठ विप्राणां (वराणां) पाद सेंचने।यानी जो फल कपिला नामक गाय के दान से प्राप्त होता है और जो कार्तिक व ज्येष्ठ मासों में पुष्कर स्नान, दान, पुण्य आदि से मिलता है वह पुण्य फल ब्राह्मण (वर) के पाद प्रक्षालन एवं चरण वंदन से प्राप्त होता है। हिंदू संस्कारों में विवाह के समय कन्या के माता-पिता द्वारा इसी भाव से वर का पाद प्रक्षालन किया जाता है। क्या कहता है विज्ञानकुछ विद्वानों की ऐसी मान्यता है कि शरीर में स्थित प्राण वायु के पांच स्थानों में से पैर का अंगूठा भी एक स्थान है। जैसे- तत्र प्राणो नासाग्रहन्नाभिपादांगुष्ठवृति 1- नासिका का अग्रभाग 2- हृदय प्रदेश 3- नाभि स्थान 4- पांव और 5- पांव के अंगूठे में प्राण वायु रहती है।चिकित्सा विज्ञान भी मानता है कि पांव के अंगूठे में कक ग्रंथि की जड़ें होती हैं, जिन पर दबाव या चोट से इंसान का जीवन खतरे में पड़ सकता है।मनुष्य के पांव के अंगूठे में विद्युत संप्रेक्षणीय शक्ति होती है। यही कारण है कि वृद्धजनों के चरण स्पर्श करने से जो आशीर्वाद मिलता है, उससे अविद्या रूपी अंधकार नष्ट होता है और व्यक्ति उन्नति करता है।पढ़ना न भूलेंः- धर्म, ज्योतिष और अध्यात्म की अनमोल बातें – यहां रखा है परशुराम का फरसा, लोहार ने काटा तो हो गई मौत!

यही कारण है कि गुरुओं, (अपने से वरिष्ठ) ब्राह्मणों और संत पुरुषों के अंगूठे की पूजन परिपाटी प्राचीनकाल से चली आ रही है।

इसी परंपरा का अनुसरण करते हुए परवर्ती मंदिर मार्गी जैन धर्मावलंबियों में मूर्ति पूजा का यह विधान दक्षिण पैर के अंगूठे की पूजा से आरंभ करते हैं और वहां से चंदन लगाते हुए देव प्रतिमा के मस्तक तक पहुंचते हैं। rajasthanpatrika.patrika.com

कुछ भी कहिए पर चापलूसी से दूर होकर चरण स्पर्श आदर के साथ किया जाए तो सुखकर होता है …


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33. illustrated rants from the Kingdom of Stupid

Lately, many of my pictures are kind of illustrated rants, which don’t feel appropriate for this blog full of children’s illustrations and stories. So…ahem…welcome to my other place, where I can rant freely, offensively and obnoxiously about some of the glaringly obvious ridiculousnesses (a new word) in this brave new world. To visit, just click on the pretty queen…


Filed under: pigeons, poetry

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34. How (un)Smart Should a Writer Be?

How unSmart 3If you’ve been reading my deep travel tales, you’ll know how un-smart I am.

Count the times I’ve been run down on the road less traveled!

I was barely home from my travels in Africa and Asia when the gods pulled a U-turn and made roadkill of me yet again.

I was filming in the Canadian Rockies

I was shooting a film on the geomorphology of the high country. Think erosion. Even solid granite breaks up over time and washes to the sea. Everything disintegrates, including the human psyche.

Especially mine.

After an exhausting day filming on scree slopes above a chain of turquoise lakes and then debriefing the tapes over dinner with the sound tech we drove to Lake Louise to be closer to our next location. It was midnight by the time we found a tent site on the perimeter of a campground.

We pitched our tent and fell asleep.

I woke at dawn with rain drubbing softly on the sagging canvas.

I heard something else.

FuzzyWuzzyI crawled half out to peer around the tent—

Grizzly! Not six feet away from me.

Front paws on the picnic table, she sniffed our cooler, our food supply. Last night we had unloaded the jeep and then hastily secured one end of our pup tent to the table before passing out.

I’m sorry! I told you, I’m not that smart!

The bear took a second to fix me in the cross-hairs of her cold gaze.

I nudged Ken and whispered, “Grizzly.” He wanted to see. I shook my head furiously. He stuck his head out, withdrew, looked at me: “Three cubs.”

Worst case scenario. Now what?

Now what?

The tent collapsed.

The weight of the cooler and everything spilling out—bacon and steaks and yogurt, and bread, coffee, apples, raisins, nuts and milk and a week’s supply of Snickers Bars—it flattened the tent with us beneath it.

Four bears were sitting on us, eating. And not quietly, I might add.

While we lay still as death.

I thought of Fred.

Fred and I had played hockey at university. He was 6-3 and damned good-looking before he met the grizzly who left him minus one hip, a broken back, no scalp, half a face, and a chewed elbow, and those were just the physical injuries.

I was eroding inside, already.

I’d been here before, my life stopped dead in its tracks. (The cheetah comes to mind, remember?) My granite sense of self becoming “Fred,” I couldn’t muster the necessary thoughts to convince myself that life had meaning.

There was nothing left to obscure the fact that life has no meaning.

There was nothing left.

Hold that thought.

If you’ve read Story Structure Expedition, you’re familiar with how I recruited authors more eloquent than myself to do the heavy explaining through moments like this. Well, here we go again:

John Gray (The Silence of Animals), he sounds like he’s been under a grizzly’s picnic tablecloth:

“Accepting that the world is without meaning, we are liberated from confinement in the meaning we have made. Knowing there is nothing of substance in our world may seem to rob that world of value. But this nothingness may be our most precious possession, since it opens to us the inexhaustible world that exists beyond ourselves.”

That’s it! What every crisis has taught me.

If Mr. Gray moves over we can squeeze physicist, Alan Lightman, into this dilemma:

In our constant search for meaning in this baffling and temporary existence, trapped as we are within our three pounds of neurons, it is sometimes hard to tell what is real. We often invent what isn’t there. Or ignore what is. We try to impose order, both in our minds and in our conceptions of external reality. We try to connect. We try to find truth. We dream and we hope. Underneath all of these strivings, we are haunted by the suspicion that what we see and understand of the world is only a tiny piece of the whole.”

Lightman is describing the fictional protagonist waking up in the Act II Crisis.

At the heart of the story, heroes see the world as it really is.

Un-smart like me

I’m not saying I’m a hero, but I certainly have been serially un-smart. My talent for not being too smart for my own good has earned me the moral authority to enter the Act III of my life.

And now, writing from the perspective of the final act, I want to share with you some of my discoveries (however arguable they might be):

  1. The meaning of a human life is to realize—by whatever means possible—that nothingness is our most precious possession 
  2. The best fictional protagonists do just that
  3. Which aids and abets our own struggle to see the world as it really is
  4. And that’s why we read fiction
  5. And perhaps why we write it.


Behind the falling rain, low voices. The canvas was suddenly snapped back to reveal a uniformed park official standing over me with a rifle. He shook his head in dismay, or disdain.

I know, I’m an idiot, I’m sorry.

Mama lay in a heap, tranquilized, while her three cubs found refuge up a tree. Campers, soggy in the early morning rain, watched in disbelief.

I know, I know,  I’m sorry! It’ll happen again, I assure you.


Good writers—like good protagonists—are never too smart for their own good.

[POST SCRIPT: All this “meaning” business notwithstanding, I didn’t sleep well in a tent for a few years after that.]

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35. पोस्ट अच्छी बुरी


पोस्ट अच्छी बुरी


कल  फेसबुक पर एक पोस्ट देखी.  फोटो में आटो वाला अपने वाहन मे विकलांगों को फ्री सर्विस देता है उन्होने अपने ओटो मे यही बात बडा करके लिखवाई हुई थी. उस पोस्ट पर लिखा था बताओ कितने लाईक मिलेंगें और उस पर मुश्किल से 10 -12 लाईक थे.

बात लाईक करने या न करने की नही है क्योकि यकीनन पढते तो सभी है बस अच्छाई को पसंद करने के लिए बस क्लिक नही कर पाते. पर मुझे यकीन है कि ऐसे लोग दिल ही दिल मे प्रशंसा भी करते होंगें.

दो दिन पहले एक अन्य तस्वीर भी देखने को मिली. आठ दस साल की लडकी की तस्वीर थी और उसमे लिखा था कि ” मेरे पापा ने कहा है कि अगर इस फोटो को एक हजार लाईक मिले तो वो सिग्रेट पीना छोड देंगें. मुझे अच्छा लगा कि लगभग 900 से ज्यादा लाईक हो चुके थे. मैने भी तुरंत लाईक कर दिया. हालाकि उसके बाद मुझे वह फोटो न्यूज फीड मे नही दिखी. पता नही लोगो ने उसे लाईक किया या  नही  वैसे आप चाहे कुछ भी कहें पर कई पोस्ट वाकई में अच्छी होती है.

एक पोस्ट तो पढ कर मजा ही आ गया . उसमे लिखा था कि मैने अभी भगवान की फोटो शेयर की है. इंतजार कर रहा हूं कि शुभ समाचार क्या मिलेगा… क्योकि उस पोस्ट पर लिखा था कि जल्दी से शेयर करो और शुभ समाचार पाओ…

बहुत समय पहले इसी प्रकार के पोस्टकार्ड आया करते थे तब समझ नही आता था कि इसे फेंक दे , फाड दें या जवाबी 50 पत्र लिख कर डाल दे…

खैर पोस्ट हर तरह की है अच्छी बुरी … हमारी ऊपर है कि हम उसे देख कर अनदेखा कर देतें हैं या लाईक करके अपनी सहमति जताते हैं.

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36. Digital India Weak

Digital India Weak /week ???

Digital India  week by  monica gupta   Digital India Weak / week ??               बेशक देशवासी Digital India week  को लेकर बेहद उत्साहित हैं सब कुछ नेट से जुड जाएगा और आराम ही आराम होगा … पर मूल भूत समस्या का क्या करें समस्या है नेट का न चलना या नेट का बेहद धीरे चलना !!!  तभी तो आज  Digital India week ???मनाए  या Digital India Weak !!!


PHOTOS: Digital India Week: PM Narendra Modis 15 point dream | The Indian Express

“I dream of a digital India where 1.2 billion connected Indians drive innovation.” (Express photo by Anil Sharma)

“I dream of a digital India where knowledge is strength and empowers people.” (Express photo by Anil Sharma)

“I dream of digital India where quality healthcare reaches right upto the remotest areas through e-health care.” (Express photo by Anil Sharma)

“I dream of digital India where cyber security becomes an integral part of national security.”

“I dream of digital India where there is mobile and e-banking for financial inclusion.”

“I dream of digital India where e-commerce drives entrepreneurship.”

“I dream of digital India where the world looks to India for the next big idea.”

“I dream of digital India where netizens are empowered citizens.” See more…

‘M-Governance (Mobile, Not Modi),’ Quips PM at Digital India Push: 10 Facts

Prime Minister Narendra Modi launching the Digital India Week. See more…

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37. Loudspeakers

Loudspeakers- कुछ ही देर पहले मेरी सहेली मणि का फोन आया. अरे !! आवाज ही नही पहचानी गई.. मैने पूछा क्या हुआ… पर आवाज ही नही निकल रही थी कल तक तो ठीक थी एक ही दिन में …. !!! मैं  तुरंत उसके घर गई. उसकी तो आवाज बिल्कुल  ही बंद थी.

मैने गुस्से मे कहा कि कितनी बार मना किया है बर्फ मत खाया कर … उसने  मायूस सा होते हुए इशारे से बताया कि नही खाई. फिर मैने पूछा खट्टी चटनी ?? उसने फिर  न की मुद्रा मे गर्दन हिला दी !! अरे तो फिर हुआ क्या? उसने लिख कर बताया कि कल किसी समारोह मे गए थे वहां डीजे पर  गाने बहुत तेज आवाज मे बज रहे थे. वहां बहुत जानकार भी मिले और उनसे बात भी करनी थी इसलिए महा भयंकर शोर मे कान के पास चिल्ला चिल्ला कर बोलना पडा इसलिए गला बैठ गया.

ओह ..नो !! इस पर उसने लिखा अरे तू क्यो लिख रही है मेरे कान तो ठीक है … ह हा हा !! मैने कहा ये भी एक बडा चिंता का विषय है. कान फूडू संगीत भी आज कल स्टेटस सिंबल बन गया है. कुछ दिन पहले मै भी एक प्रोग्राम मे गई  वहां भी बहुत तेज संगीत बज रहा था इस पर जब  मालिक से बोला कि क्या संगीत की ध्वनि धीमे  हो सकती है  इस पर वो बोले अजी आप कमाल करती हैं इतने पैसे खर्च किए हैं डीजे के लिए…  आवाज  कम नही होगी..

और पूरे कार्यक्रम में हम इशारों मे ही बात करते रहे… या फिर वटस अप पर मैसेज भेज कर बाते करते रहे. मेरी सहेली ने जब अपना मोबाईल देखा तो बीस मिस्ड काल थी उसके पति बाहर बुलाने के लिए कर रहे थे… पर सुनाई ही नही दिया…मैने सलाह दी कि ऐसे मे वाईब्रेशन पर लगा देना चाहिए और मोबाईल हाथ में पकडे रहना चाहिए.

वैसे  वो भी अच्छा अनुभव था. मूड खराब करने का कोई फायदा नही क्योकि लोग नही सुधरेंगें पर हम नई नई भाषा जरुर सीख जाएगे.




Loudspeakers photo

Be kind to your ears, listen quietly

Give it a try, turn the volume down a little, and once you get used to listening quietly, turn it down a little more. Granted, quiet listening works best in quiet places; in noisy environments stick with in-ear, closed-back, or noise-canceling headphones. Avoid ear buds and open-back headphones, they don’t hush external noise so you have to play music a lot louder than you might realize.

If you do the bulk of your listening in noisy places, continuing with ear buds (the type that come with phones) may eventually lead to hearing loss from continued exposure over a long period of time to excessively loud sound. I covered how ear buds, in-ear, and closed- and open-back headphones work and how they differ on previous blogs.

If you have to listen in noisy places or while commuting, consider buying in-ear or closed-back full-size headphones to seal out noise. When you reduce the background noise level competing with the music, you can turn the music’s volume way down, and the difference can be very significant. Even inexpensive closed-back or in-ear headphones will help you listen more quietly.

I find with the better-sounding in-ear and closed-back headphones I can listen at a much lower volume and still not feel like I’m losing detail or the music’s energy. Quiet listening draws me in more, so I listen more attentively. Once you get used to listening quietly it will become the new norm, and your ears will suffer less listening fatigue.

Noise-canceling headphones block more noise than any other type of headphone, so you can turn the music down even more, but most noise-canceling models don’t sound as good playing music as equivalently priced closed-back headphones. See more…

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38. Ancestry Looking Forward: Orphan Black and Real Cosima

Cosima Herter and Graeme Manson

My Longreads profile of Orphan Black’s brilliant science consultant Cosima Herter — known to the show’s actors and creators as “Real Cosima” — ranges from science, chance, and emotion to Darwin, humanized mice, DIY synthetic biology, and much more. Here’s how it starts:

BBC America’s Orphan Black seems so immediate, so plausible, so unfuturistic, that Cosima Herter, the show’s science consultant, is used to being asked whether human reproductive cloning could be happening in a lab somewhere right now. If so, we wouldn’t know, she says. It’s illegal in so many countries, no one would want to talk about it. But one thing is clear, she told me, when we met to talk about her work on the show: in our era of synthetic biology — of Craig Venter’s biological printer and George Church’s standardized biological parts, of three-parent babies and of treatment for cancer that involves reengineered viruses— genetics as we have conceived of it is already dead. We don’t have the language for what is emerging.

It’s one of my favorite things I’ve written, and also one of the strangest. It’s very much keeping with the forward-looking aspects of the book I’m working on. And it has the endorsements of a whole lotta Orphan Blackers, including, Tatiana Maslany, Graeme Manson, and Herter herself, which makes me happy.

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39. Subsidy

cartoon subcidy by monica gupta  Subsidy    बहुत सीधी साधारण सी बात पूछी जा रही है नेता जी से कि आपने कहा कि सक्षम लोग सब्सिडी न लें तो लाखों लोगों ने इसे नही लिया पर जो लोग सक्षम हैं उन्हें आरक्षण न लेने के लिए भी तो बोलना चाहिए … पर नही शायद नेता लोग अपना वोट बैंक बनाए रखने के लिए यह बात कभी नही बोलेंगें …

रही बात खुद की तो वो ढेरों सांसद सब्सिडी का भरपूर लाभ ले रहे हैं

Mutton cutlet for Rs 18 and Dosa for Rs 6: Government faces heat over subsidy on Parliament canteen food

At a time when the Narendra Modi government is taking steps to cut subsidies, there is a shocking response to an RTI query. It has been revealed that many of the food items served in Parliament canteen are sold at just one-tenth of the cost of raw-materials used in preparing them.

For instance, the cost for procuring raw items for a dish like vegetable stew comes to about Rs 41 while the MPs are getting it for just Rs 4, which is a subsidy of about 90%.

The canteens in Parliament got a total subsidy of Rs 60 crore during last five years, revealed the RTI plea.

Talking about the issue, Union Parliamentary Affairs Minister M Venkaiah Naidu said that he would discuss the issue and make attempts to reach a solution.

“I don’t deny it as a Minister. There’s the Lok Sabha and the Rajya Sabha, and everyone should be attentive about this,” he added.

Parrying queries over whether his government would discontinue with the subsidy, he said it has been going on for long and was not something decided by the BJP government.

The RTI activist, whose plea made the revelation, slammed the government over the issue, saying, “They tell others to give up on subsidies, but Parliament canteen gets heavy subsidy. The government should end this.”

In his RTI plea, the petitioner had sought answers to questions like “Has the Union government had taken cognizance of adverse media reports and public relations on providing food-items in canteens of Parliament at highly subsidised prices?”

Meanwhile, Aam Aadmi Party leader Alka Lamba said it was shocking that such subsidy was given in Parliament canteen, pointing that the food was already cheap for the members.

Congress, meanwhile, backed a re-look at the huge subsidy being given to the canteens, saying a “course correction” is needed on the matter. Party spokesperson Tom Vadakkan said, “If you look at the scale of subsidy being provided, I think there needs to be some course correction.” He, however, noted that subsidised canteens function in different ministries. See more…

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40. Toothpaste

cartoon toothpaste by monica gupta

Toothpaste … ये टीवी विज्ञापन वाले भी ना दिमाग खराब कर के रख देते है…कभी टूथपेस्ट में नमक कभी काली मिर्च कभी भुना जीरा … क्या करें इनका !!!

How to use toothpaste to clean trainers reduce bags under eyes and buff your nails

It may be designed to clean teeth but did you know that a simple tube of toothpaste can be used in countless unconventional ways?

It’s long been hailed for its ability to clear up pesky zits but a cheap tube of the paste can be used to clean trainers, reduce bags under tired eyes and even give nails a high shine finish.

It’s long been hailed for its ability to clean teeth and clear up pesky zits but a cheap tube of the paste can be used do so much more than that. FEMAIL rounds up the unconventional ways you can use it See more…

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41. Story Time

Story Time

W की मिठा E
(अंग्रेजी वर्णमाला से बनी कहानी का आनन्द लो)

W बहुत ही छोटा पर शरारती बच्चा था। मम्मी k कहने पर उस k  डैD  ने  उसे A टू Z Vधालय में भर्ती करवा दिया। उनका Vधालय   jल  K पास होने कारण वहाँ अक्सर c पाही घूमते रहते थे। बच्चों को उन्हें देखना अच्छा लगता था। सड़क K  दूसरी  Oर Bकानेरी नमकीन और Kक की दुकानें थी। बच्चों की पाठशाला में उन्हें पढ़ार्इ के साथ-साथ अच्छी-अच्छी बातें भी C खाते थे।

Aक बार उनकी कक्षा में नोटिस आया कि जो बच्चा सबसे अच्छी Cख अथवा Vचार देगा उसे प्राध्यापिका E नाम में मिठाE देंगी W तो नया-नया ही Vधालय गया था, पर मिठाE का नाम सुनते ही उसके मुँह में पानी आ गया।

उनकी नैंC   Tचर कक्षा में आर्इ और एक-एक बच्चें को अपने पास बुलाकर उनK Vचार और  Cख सुनने लगी।

सबसे पहले  Aकता ने बताया कि kला खाकर छिलका कूड़ेदान में ही फैंकना चाहिए। Tटू बोला दूध Pकर ताकतवर बनना चाहिए।

मUर बोला जब दो लोग बातें कर रहें हों तो Bच में नहीं बोलना चाहिए। कPश ने बताया कि सभी से Sसी वैसी बातें ना करके Cधे मुँह बात करनी चाहिए। कभी भी Pठ  Pच्छे नहीं बोलना चाहिए। Bना ने कहा के Eश्वर में Vश्वास रखना चाहिए। उनकी पूजा करके Rती उतारनी चाहिए।

Dम्पी चुप बैठा था। Tचर के पूछने पर उसने बताया कि वो Bमार है। अब बारी आर्इ की। खाने के शौकीन ने बताया कि ज्यादा  Kक और Iस्क्रीम नही खानी चाहिए Qकि कर्इ बार चटपT चीजों से भी पेट दर्द हो जाता है, इसीलिए हल्का खाना ही खाना चाहिए। यह सुनकर सभी बच्चे हँस पड़े।

Gतेन्द्र आज कक्षा में नही आया था क्योंकि वो Cकर (राजस्थान) गया था।

सिY   Oमी,  Uवी, Eना और Eशा के इलावा सभी ने अपने Aचार  Vर को बताए। उधर Tना चुपचाप बैठी रही Qकि वो घर से लड़कर I थी।

T चर सभी बच्चों के Vचार लेकर प्राध्यापिका के पास गर्इ।

उन्हें सभी बच्चों के Vचार इतने पसन्द आए कि खुश होकर उन्होने सभी बच्चों को मिठाE  Eनाम में दी। बच्चों ने Aक साथ मिलकर मिठाE  खार्इ और इतने में छुटटी की घंT भी बज गर्इ।

Publised in 98 in  Rajisthan Patrika Jaipur  articel in rajasthan patrika

कहानी कैसी लगी … जरुर बताईएगा :)



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42. Doctors Strike

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Doctors Strike  कोई शक नही कि डाक्टर्स की हडताल आम आदमी के लिए बेहद परेशानी का सबब बन जाती है … जैसाकि आजकल दिल्ली मे देखने को मिल रहा है

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43. Short nap

Short nap

कल हाई वे जाते हुए एक कार हमारे आगे निकली और कुछ ही देर में हमारे देखते ही देखते सीधा सडक से नीचे उतरती चली गई. अचानक उसके ब्रेक की आवाज से हमारा ध्यान गया. ना कार का टायर फटा न सामने से कोई पशु आया और न ही चालक ने शराब पी रखी थी… शुक्र है कि बहुत बचाव हो गया पर हुआ क्या ??? पूछने पर उसने झेपते हुए बताया कि दो चार दिन से आफिस में बहुत काम था और दिल्ली जाना भी जरुरी था.

थकावट बहुत थी और नींद भी पूरी नही हुई थी शायद अचानक कार चलाते झपकी आ गई थी.अरे बाप रे..बेशक वाहन चलाते हुए मोबाईल पर बात करना खतरनाक है पर बिना नींद पूरी हुए वाहन चलाना भी कम खतरनाक नही …

वैसे बस पर भी लिखा होता है कि यात्री का 1 , 2 और 3 सीट पर सोना मना है वो इसलिए लिखा होता है कि  अक्सर यात्री को सोता देख कर वाहन चालक को भी नींद आ जाती है…

पलक झपकते ही कोई बहुत बडी दुर्धटना न हो जाए. इसलिए घर से तरोताजा होकर ही निकलिए …वैसे आप तो ऐसा नही करते होंगें और अगर करते हैं तो जरा नही बहुत सोचने की दरकार है.. आपकी जिंदगी की यात्रा शुभ रहे

short nap बेशक फायदे बहुत है पर अगर आप किसीकार्यक्रम में मंच पर ही झपकी लेने लग जाएगें तो हंसी का पात्र बन जाएगें और ड्राईव करते झपकी लेंगें तो  जान लेवा हो जाएगी … क्योकि भी चीज जिंदगी से बढी नही इसलिए अगर जिंदगी से सच्चा प्यार है तो टेंशन, झपकी थकावट सब घर पर  छोड कर ही निकलना बेहतर है….


Hints From Heloise: Power up with a nap! – The Washington Post

Dear Readers: Are you fully awake? Are you TIRED? Are you functioning, but sort of on 3/4 power? You could be one of the millions and millions of folks who are sleep-deprived! We work many hours, do errands on the way home, fight traffic and worry about late buses and trains. Then we come home and there is more to do. If you can find 20-30 minutes for a power nap, it could help tremendously.

Try to find a quiet spot (or wear earplugs), keep light to a minimum (or cover your eyes with something) and find the coolest (temperature) place you can.

If you can’t nap (especially at work), try for a short break — walk around the office or outside. Even go into a bathroom stall and close your eyes, block out noise and quiet your mind — yes, I’ve done this! — Heloise See more…

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44. हम और हमारी नकारात्मक सोच

हम और हमारी नकारात्मक सोच

कल ही हमारे मित्र विदेश से लौटे. उनको रिसीव करने हम भी एयर पोर्ट गए.वहाँ कार मे बैठ्ने से पहले उन्हे मिठाई खिलाई तो उन्होने उसका रैपर कोई कूडा दान ना दिखाई देने की वजह से सड्क पर ना डाल कर अपनी जेब मे ही डाल लिया. जबकि हमारे ही भारतीय मित्रो ने खुद तो मिठाई के रैपर को जमीन पर ही फेंक दिया और हसँते हुए अपने मित्र को सलाह देने लगे कि भई, यह तो भारत है यहाँ सब कुछ होता है यहाँ क्या सोचना … पूरी सडक अपनी है कही भी फेंक दो … बे वजह जेब क्यो खराब करनी है …उस समय तो मैं चुप रही पर वापिस लौट्ते वक्त यही सोचने लगी कि सारे आरोप सरकार पर लगा कर हम निशचिंत होकर बैठ जाते है कि सरकार ये नही कर रही वो नही कर रही बिना यह जाने कि हम क्या कर रहे है यह हमारी नकारात्मक सोच नही तो क्या है. अगर हम सभी अपना अपना फर्ज़ समझ ले तो क्या नही हो सकता.
हम विदेशो की बात करते हैं कि वहा कठोर कायदे कानून है वहाँ सफाई रखनी जरुरी होती है नही तो फाईन लग जाता है वगहैरा वगहैरा . पर उसके मुकाबले हम यहा क्या कर रहे हैं सिवाय कोसने के कि हम कितने गंद मे रह रहे हैं …
और तो और बार बार मना किया जाता है कि गाडी चलाते समय सीट बेल्ट बाँध ले. हम मे से कितने बाधँते है. हाँ , अगर सामने चैकिंग़ हो रही होगी तो फाईन के चक्कर मे फटाफ़ट लगा लेग़ें … गाडी चलाते समय मोबाईल का इस्तेमाल भी नही करने की सलाह दी जाती है. पर हम तो महान है ना सबसे व्यस्त आदमी है अगर बात नही की तो लाखो का नुकसान जो हो जाएगा. हाँ, अगर कोई ट्क्कर वक्कर हो गई तो दोष अपना नही मानेग़ें …
अगर हम अपनी नकारात्मक सोच हटा कर सकारत्मक सोचेगे और समाज मे रहते हुए नियमो का पालन करेगें तो हमारा देश भी आदर्श देश बन सकता है.
यही बात काफी हद तक मीडिया पर भी लागू होती है वो समाज को सच्ची दिशा दिखा सकता है पर उसकी सोच भी कम नही है मार पिटाई, खून खराबा, अन्धविश्वास, फालतू की फिल्मी खबरो आदि से भरी रहती है खबरे पर जब बात आती है कुछ ऐसी खबरो की जिनसे समाज मे चेतना आए … वो तो गायब ही रहती है अब ताजा उदाहरण ही है कि एक स्कूली बच्चे ने एवरेस्ट पर जीत हासिल की और सबसे कम उम्र का विजेता बन गया कोई बच्चो का खेल नही था कि वो ऐसे ही चढ गया पर वो खबर भी ना के बराबर रही. जब मैं कुछ बच्चो का इंटरवयू लेने पहुची कि उन्हे यह जान कर कैसा लगा कि उनकी ही उम्र का अर्जन ऐवरेस्ट को जीत कर लौटा है. उन्हे तो हैरानी हुई क्योकि इस बात की जानकारी ही नही थी उन बच्चो को कि ऐसा भी हुआ है अब भला बताओ कि समाज के सामने अगर उदाहरण ही नही रखे जाएगे तो समाज तरक्की कैसे करेगा सिर्फ क्राईम से तो गाडी नही चलेगी ना.

हम और हमारी नकारात्मक सोच
हम सभी को एक दूसरो पर दोष डालने की बजाय खुद को अच्छा बनाना होगा अपनी सोच सकारात्मक रखनी होगी अच्छे उदाहरण समाज के सामने रखने होग़ॆं ताकि उनका अनुकरण किया जा सके. इसमे आपसे अच्छी भूमिका तो कोई निभा ही नही सकता …

हम और हमारी नकारात्मक सोच

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45. जवाब लाजवाब

जवाब लाजवाब

उफ़………….. इनकी हाजि़र जवाबी

हाजिरजवाबी अनूठी कला है, जब इसमें हास्य व्यंग्य का मिश्रण हो जाए तो मजा दुगुना हो जाता है और अगर यह हास्य व्यंग्य विश्व प्रसिद्ध हस्तियों का हो तो कहना ही क्या……..।
इस लेख में हम कुछ विश्व प्रसिद्ध हस्तियों के चुटीले अंदाजो से आपको रूबरू करवा रहे हैं।

सरोजनी नायडू
भारत कोकिला सरोजनी नायडू को कौन नही जानता। एक प्रखर राजनैतिक कार्यकर्ता, संवेदनशील कवयित्री और देश की स्वतंत्रता ही जिनका उददेश्य था। वो समय-समय पर हल्की-फुल्की टिप्पणियाँ करने से बाज नही आती थी। एक बार वो किसी सम्मेलन में गर्इ। वहाँ फोटो खीचने के लिए फोटोग्राफरों की लार्इन लग गर्इ। तब उन्होनें उनसे कहा, चलो भर्इ, जल्दी करो। मैं सब ओर से एक जैसी ही हूँ, मोटी और गोल-मटोल।

मार्च 1947 में जब वो प्रथम एशिआर्इ संबंध सम्मेलन के प्रतिनिधियों की बैठक को संबोधित करने के लिए आमंत्रित की गर्इ तो हाल खचाखच भरा हुआ था। वो उठी। भीड़ का जायजा लिया और बोली कि इस अपार भीड़ को देखकर मैं इतनी भावुक हो उठी हूँ कि मेरे मुहँ से आवाज ही नही निकल पा रही है। किसी महिला के मुहँ से आवाज ना निकलना कोर्इ मामूली बात नही है।

एक बार एक राजनैतिक कार्य के सिलसिले में गोपाल कृष्ण खोखले श्यामवर्णी नायडू से मिले और सोचा कि उनके रंग पर उन्हें खिजाया जाए। अत: उन्होने मुस्कुराते हुए चुटकी ली,  क्या आप मृत्यु के इतनी निकट पहुँच गर्इ हैं कि उसकी परछार्इयों ने आपकी ऐसी रंगत बना दी है। सरोजनी उनका मतलब समझ गर्इ। मगर वह बिल्कुल नही झिझकी और हँस कर बोली,  नहीं मैं जीवन के इतने निकट आ गर्इ हूँ कि उसकी तपिश ने मुझे झुलसा दिया है।

विनोबा भावे
विनोबा भावे ने स्वयं को निर्धनों और शोषितो से जोड़े रखा। उन्होनें भूदान आंदोलन के जरिए सामाजिक सुधारो को नर्इ दिशा दी। सौम्य और मृदुभाषी विनोबा अपनी नपी तुली टिप्पणियों की बदौलत स्वयं को विवादो से दूर ही रखते थे। एक बार कुछ पत्रकार विनोबा जी का साक्षात्कार लेने उनके आश्रम गए। विनोबा जी ने उनका सत्कार किया और पत्रकारों के प्रश्न का जवाब  देने के लिए तैयार हो गए। लेकिन उन्होंने माँग रखी कि पहला प्रश्न वो पूछेंंगें। पत्रकार सोचने लगे कि आखिर विनोबा जी के मन में क्या है। तब विनोबा ने उनसे पूछा कि वो किस भाषा में अपने दिए गए प्रश्नों के उत्तर की अपेक्षा करतें हैं। पत्रकार जानते थे कि आचार्य भाषाविद हैं। उन्होनें निश्चय किया कि भाषा के चयन का निर्णय वे खुद ही लें। पर सभी पत्रकार जड़वत रह गये जब आचार्य ने उत्तर दिया कि उनकी नजर में सर्वोतम भाषा मौन भाषा है। और शांत भाव से आश्रम में टहलने लगे।

सर सी.वी. रमन

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित सर सी.वी. रमन को कौन नही जानता। उन्होनें प्रकाश के संगठन और व्यवहार पर नया सिद्धांत खोज निकाला, जिसे रमण प्रभाव के नाम से जाना गया। इस विशिष्ट खोज की 25वीं जयंती के अवसर पर वो पैरिस गए हुए थे। वहाँ कुछ फ्रांसीसी वैज्ञानिको ने इस मौके पर भव्य समारोह का आयोजन किया। वर्दी में सजे-धजे बैरे अतिथियों को मनपसंद पेय पेश कर रहे थे। एक बैरा रमण के पास आया और उसने शैम्पेन भरे गिलासो की ट्रे उन की ओर बढ़ा दी लेकिन रमण ने उसे नही लिया। बार-बार उन्होनें विनम्रता से इंकार किया कि वह पीते नही है लेकिन फिर सोचने लगे कि उन्हें इस इंकार का कोर्इ कारण अवश्य बताना होगा। इसी उधेड़बुन में लगे थे कि जल्दी ही उन्हें अपनी समस्या का समाधान मिल गया। उनके पास खड़ी एक महिला ने अपने साथी को बताया कि यह प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर सी.वी. रमण हैं। यह रमण प्रभाव के लिए जाने जाते हैं। बस, यह बात सुनकर जो दोस्त उन्हें पीने के लिए बार-बार आग्रह कर रहे थे, वह उनकी ओर मुडे़ और बहुत सौम्यता से बोले,  मित्रों, आपने अल्कोहल पर रमण प्रभाव अवश्य देखा होगा पर मैं आपको रमण पर अल्कोहल प्रभाव देखने का अवसर कभी नही दूँगा। उनके इस विनोदपूर्ण जवाब  से लोगों में हँसी के फव्वारे फूट गये।

अल्बर्ट आइंस्टीन


अल्बर्ट आइंस्टीन भौतिकी के क्षेत्र में हुए सभी आधुनिक विकासों के श्रेय के हकदार हैं। अपने बारे में उन्होंनें कुछ पत्रकारों और फोटोग्राफरों के बारे में कहा कि वो अजायब घर में रखने लायक वस्तु हैं। वह मुख्यधारा से छिटक कर बाहर गिर गए हैं। फोटोग्राफरों द्वारा विभिन्न मुद्राओं में तस्वीरें खींचने के बाद उनसे उनके व्यवसाय के बारे में पूछा गया तो उन्होंनें तपाक से जवाब दिया कि वो तो माड़ल का काम ही कर रहें हैं, तरह-तरह के पोज़ में फोटो खिचवा कर। उनसे जब उनकी खोज के बारे में जनप्रतिक्रिया की राय पूछी गयी तो उन्होंनें कहा कि अगर मेरा सिद्धांत सफल रहा तो जर्मन दावा करेंगें कि मैं एक जर्मन हूँ। और सिवस कहेंगें कि मैं एक सिवस हूँ। किन्तु यदि असफल रहा तो सिवस कहेंगें कि मैं जर्मन हूँ और जर्मन कहेंगें कि मैं एक यहूदी हूँ।
एक बार आइंस्टीन के बेटे ने उनसे पूछा कि वो इतने प्रसिद्ध कैसे हैं। इस पर उन्होंनें कहा कि  बेटे, एक बार एक अंधा कीड़ा फुटबाल पर चलने कि कोशिश कर रहा था उसे यह नही मालूम था कि वो गोल है। मगर इस मामले में मैं भाग्यशाली निकला, यह बात मेरे ध्यान में आ गर्इ।
एक बार आइंस्टीन ने फोटोग्राफर ए.डब्लयू रिचडऱ्स से मजाक में कहा  मुझे अपने चित्रों से नफरत है। यदि इनकी वजह न होती…….. फिर अपनी मूँछों पर हाथ फेरते हुए बोले कि इनकी वजह न होती तो वो………. एक औरत नज़र आते।

जवाब लाजवाब

अलैक्जैंड़र फ्लेमिंग
पेनिसलिन की खोज के लिए प्रसिद्ध अलैक्जैंड़र फ्लेमिंग मितभाषी व्यकित थे। एक बार वो बंदरगाह के निकट होटल में ठहरे जहाज को पानी में तैरते देख रहे थे। उन्हें वो दृश्य बहुत अच्छा लग रहा था लेकिन भूख तेज़ लगने के कारण वो भोजनकक्ष की ओर चल पड़े। तभी सामने से दो पत्रकार आ रहे थे। उन्होंनें अदब से नमस्ते करके यह पूछना चाहा कि जब एक महान वैज्ञानिक नाश्ते के लिए जा रहा हो तो उसके मन में क्या विचार उमड़ते हैं। फ्लेमिंग ने भी अपनी मुद्रा गम्भीर कर ली और बोले कि विचार तो बहुत उमड़ते हैं। पत्रकार भी अपने पैन लेकर तैयार हो गए कि शायद कोर्इ ऐसी बात सुनने को मिले जो कल की सुर्खियाँ बन सकें। फ्लेमिंग ने कहा कि वो वाकर्इ में इस समय विशेष बात ही सोच रहा हूँ। यह खबर आपके लिए किसी वरदान से कम नही होगी……..। लेकिन जल्दी ही उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। उत्तर मिला, मैं एक विशेष बात सोच रहा हूँ कि मैं नाश्ते में कितने अंडे़ खाँऊ……… एक या …… दो………

जवाब लाजवाब

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46. झंडा उंचा रहे हमारा

झंडा उंचा रहे हमारा



हमारा तिरंगा
बच्चों, मैं भारत की शान हूँ। तीन रंग लिए मैं सभी को निराला और मन भावन लगता हूँ। पता है, मैं हूँ कौन? जी हाँ, मैं हूँ भारत देश का ध्वज, यानि झण्ड़ा।
जब भी आप मुझे लहराते-फहराते देखते होंगे तो आपके मन में विचार जरूर उठता होगा कि आखिर मेरा जन्म कब कहाँ और कैसे हुआ। आज मैं आपको अपने सफर की कहानी सुनाता हूँ। मेरा रूप जैसा आप आज देखते हैं ऐसा नहीं था। मुझमें समय-समय पर बहुत बदलाव आए पर अब मेरी पहचान बन चुकी है। विदेशों में अनेक झण्ड़ों के बीच में मैं शान से इठलाता हूँ। पता है, 29 मर्इ, 1953 को मैं एवरेस्ट पर लहरा रहा था। मेरी कहानी कोर्इ एक दिन या एक समय की छोटी सी कहानी नहीं है। मेरा मस्तक ऊँचा रखने के लिए हजारों वीर सैनिकों ने बलिदान दे दिया। अपना खून पानी की तरह बहा दिया पर मेरी शान कम ना होने दी।
आपने रामायण या महाभारत तो जरूर पढ़ी होगी। उस समय की पताका या झण्ड़ा यानि मैं लम्बे त्रिभुज आकार में था। मेरे ऊपर भगवान सूर्य का चित्र अंकित रहता था। लंका में भी अलग प्रकार का झण्ड़ा फहराया जाता था। संस्कृत में भगवान विष्णु की पूजा में लिखे एक श्लोक को गरूड़ ध्वज कहा गया जबकि गीता में अर्जुन के ध्वज को कपि ध्वज के नाम से जाना गया। समय-समय मेरे रूप में परिवर्तन आता रहा। अंग्रेज़ी राज्य द्वारा स्थापित सरकारी भवन व मुख्य स्थानों पर यूनियन जैक फहराने लगा। बीसवीं सदी के शुरू में जब देशवासियों की कुछ आँखें खुली। अंग्रेज़ी अत्याचारों से जनता तंग आ चुकी थी। पता है, भारत का पहला झण्ड़ा 7 अगस्त, 1906 को कोलकाता के पारसी बागान चौराहे पर फहराया गया। तब मुझमें तीन रंग लाल, पीला और हरा थे। लाल रंग वाले भाग में आठ सफेद कमल थे। बीच वाले पीले रंग पर नीले रंग में वन्देमातरम लिखा था। नीचे हरे भाग पर बायीं तरफ सफेद सूर्य और दायीं ओर आधे चन्द्रमा के बीच एक तारा बना हुआ था।
मैड़म कामा के दिमाग  में देश के लिए झण्ड़ा तैयार करने का विचार आया। जो झण्ड़ा उन्होंने बताया उसमें केसरिया, सफेद तथा हरा रंग रखा गया। पता है, केसरिया भाग में कमल तथा सात नक्षत्र थे। वन्देमातरम को विशेष लोकप्रियता मिली हुर्इ थी। बंकिम चन्द्र चटर्जी जोकि बगला के प्रसिद्ध उपन्यासकार थे उन्होंने वन्देमातरम की रचना 1882 र्इ0 में की थी। समय धीरे-धीरे चल रहा था कि अचानक जलियाँवाला बाग के घटनाक्रम ने मेरा रूप ही बदल दिया। सन 1923 में झण्ड़े रंग-रूप, आकार का ध्यान रखा गया। मेरी लम्बार्इ और चौड़ार्इ में तीन और दो का अनुपात रखा गया। तीन रंग लाल, हरा, तथा सफेद रखा गया। सफेद रंग पर चरखे को अंकित किया गया। मुझ पर चरखा इस कारण लगाया गया क्योंकि गाँधीजी स्वदेशी प्रचार कर रहे थे। खददर को उस समय विशेष मान्यता दी गर्इ थी। सिर्फ चरखा ही लोगों की जरूरतों को पूरा कर सकता था। इसलिए चरखे को मुझ पर अंकित करवाने की विशेष मान्यता मिली। अभी बात कुछ बननी शुरू ही हुर्इ थी कि सन 1923 में मर्इ महीने में नागपुर के वासी ने रोक दिया। बस तब काफी कहा-सुनी हुर्इ और झण्ड़ा सत्याग्रह का आरम्भ हो गया। 18 जुलार्इ 1923 को झण्ड़ा सत्याग्रह दिवस मनाने की घोषणा हो गर्इ थी और पता है इस आन्दोलन के कर्णधार कौन थे- लौह पुरूष सरदार वल्लभ भार्इ पटेल।
मेरे बारे में अनेको गीत लिखे गए जो उन लोगों के लिए प्रेरणा बने जो चाहते थे कि भारत आजाद हो, स्वतंत्र हो। समूचे राष्ट्र का एक ही लक्ष्य बन गया था कि यूनियन जैक के स्थान पर जब मैं फहरूंगा वही दिन हमारा सर्वश्रेष्ठ दिवस होगा। वीरों की मेहनत रंग लार्इ। 26 जनवरी का दिन स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाने की परम्परा पणिड़त जवाहर लाल नेहरू द्वारा आरम्भ की गर्इ। फिर मुझमें काफी बदलाव आए। चरखे का रूप छोटा कर दिया गया। हर रंग विशेष सूचक बना दिया गया। सन 1933 र्इ0 में मुम्बर्इ में एक बैठक में यह प्रस्ताव रखा गया कि मेरा रंग तिरंगा ही होगा और 3 गुणा 2 का आयताकार होगा और मेरे तीन रंग भगवा, श्वेत तथा हरा होगा। 30 अगस्त,1933 र्इ0 का दिन ध्वज दिवस के रूप में मनाया गया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने भी यह साबित कर दिया कि राष्ट्रीय ध्वज ही किसी देश के गौरव का चिन्ह है और मेरा सम्मान ही देश का सम्मान है।
22 जुलार्इ 1947 र्इ0 को मुझे नया रूप प्रदान किया गया। अनुपात भी पहले वाला था, रंग भी तीन थे किन्तु सफेद रंग पर बने चरखे के स्थान पर चक्र अंकित कर दिया गया। यह चक्र सारनाथ के स्तम्भ से लिया गया जोकि लगभग ढ़ार्इ हजार से भी पहले अशोक ने बनवाया था। इसी स्तम्भ के ऊपर बनी शेरों की त्रिमूर्ति राज्य चिन्ह के रूप में स्वीकार की गर्इ।
चक्र में चौबीस रेखाएं हैं। इनका अभिप्राय चौबीस घण्टों से बताया गया है। दिन-रात, चौबीस घण्टे हम अपने कार्यों  में लगे रहे यही प्रेरणा हमें चक्र देता है। दूसरी ओर चक्र का अर्थ हम गतिशीलता से भी लगा सकते हैं। जहाँ एक ओर सफेद रंग को विद्वानों ने सादा जीवन उच्च विचार का प्रतीक माना है वहीं हरा रंग विश्वास का प्रतीक है जोकि मनुष्य की अनिवार्य अच्छार्इ है। हरियाली को भी हरे रंग में माना गया है। मुझ में हरे रंग को इसलिए भी स्थान मिला है क्योंकि भारत कृषि प्रधान देश है। केसरिया रंग की प्रेरणा से ही वीरों में, नौजवानों में त्याग और बलिदान की ललक बढ़ी थी।
सच, मैं किसी राज्य या वर्ग का ना होकर सम्पूर्ण भारत वर्ष का हूँ। मैं जहाँ भी लहराऊंगा उन सभी को स्वतंत्रता, प्रेम और भार्इचारे का सन्देश देता ही रहूंगा।
झण्ड़ा ऊंचा रहे हमारा
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा

जय हो                         जय हो                                            जय हो

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47. नाजुक हैं आदमी

नाजुक हैं आदमी …

सुन कर आप सोच रहे होगे कि भला आदमी और नाजुक … हो ही नही सकते … लेकिन यह बात काफी हद तक सही है हालांकि अपवाद तो हर जगह होते हैं.


man emotional  photo


असल में, आदमी खुद दिखाते नही हैं .. जैसाकि हम महिलाएं  करती हैं  कि तुरंत रोना शुरु कर देती हैं लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि ज्यादातर आदमियो का दिल एक दम मोम की तरह होता है पर वो मजबूत हैं बस यह दिखाने की कला उन्हें आती है.

अभी कुछ दिन पहले मेरी सहेली अपने बच्चे को स्टेशन छोडने आई तो उसने बताया कि इसके पापा इसे छोडने कभी नही आते वो तो इसे बाय भी नही बोल सकते. इसके एक दिन जाने से पहले ही वो उदास हो जाते हैं. पापा को देख कर बेटा भी उदास हो जाता है इसलिए उसे ही हमेशा मन पक्का करके छोडने आना पडता है.

एक हमारे पडोसी हैं जब से उनकी बेटी की शादी हुई है तब से वो चुप से हो गए हैं.  बेटी जब भी मिलने घर आती है वो उससे गले लग कर खूब रोते हैं. अब जब उसके भी बेटी हो गई है उनके वापिस जाने के बाद वो अकेले बैठ कर खूब रोते हैं फ़िर  हार कर उनकी पत्नी को मन मजबूत करके उन्हे चुप करवाना पडता है.
एक मित्र तो और भी कमाल है. उनकी लडकी 25 साल की हो गई है. जब भी उसके लिए कोई रिश्ता आता है तो वो किसी छोटे बच्चे की तरह रोने लग जाते हैं.  दीपक जब से पेपर मे प्रथम आया और उनके घर जब भी बधाई का फोन आता उसके पापा भावुक हो उठते.
मोहन जी की पत्नी जब तक अस्पताल  मे थी वो उनसे मिलने नही गए क्योकि वो उन्हे बीमार नही देख सकते थे.  वो अपना ही दिल पकड कर बैठ गए कि उन्हें ही कही कुछ ना हो जाए ..
ऐसे ना जाने कितने उदाहरण है इस बारे मे … जिससे बस एक ही बात सामने आती है कि आदमी भी नरम दिल के इंसान होते हैं बस वो दिखाते नही है अपने दिल मे ही रखते हैं यह बात आपको भी पता होगी … है ना … तो अगर आप किसी को पत्थर दिल आदमी बोले तो बोलने से पहले सोच लें क्योकि नाजुक हैं आदमी… !!!

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48. Dreaming

सैर सपनों की दुनिया की …. आईए !! आज आपको सपनो की दुनिया की सैर करवाते हैं. सपनों की दुनिया का यह शहर किसी अजूबे से कम नही है. यहाँ आकर कभी हम बच्चे बन जाते हैं तो कभी बूढे. कभी नेता बन जाते हैं तो कभी हीरो बन कर जनता को ओटोग्राफ दे रहे होते है. कुल मिलाकर इस दुनिया मे आने पर हम कोई भी रुप धारण कर सकते हैं या कुछ भी अनहोनी होते देख सकते हैं.
सपनो की इस लाजवाब दुनिया के सफर मे सबसे पहले हमे अनु मिली. 40 साल की अनु सर्विस करती हैं और दिन भर बहुत व्यस्त रहती है. जाहिर है कि घर पहुंच कर बिस्तर पर जाते ही नींद की आगोश मे चली जाती होगी. अनु ने भी मुस्कुराते हुए बताया कि यकीनन उन्हें लेटते ही नींद आ जाती है और फिर Dreaming…

वैसे तो ज्यादातर सपने उठने के साथ ही भूल जाते हैं पर एक सपना है जो उसे अभी भी अक्सर दिखाई देता है. सपना है कि वो स्कूल की परीक्षा देने जा रही है और देर हो गई है. पेपर शुरु हो चुका है और वो घबराहट के मारे रोने लगती है तो उन्हे परीक्षा मे बैठने की इजाजत मिल जाती है पर समय कम होने की वजह से घबराहट मे उनकी स्याही की दवात गिर जाती है और सारी उत्तर पुस्तिका खराब हो जाती है. जब उनकी नींद खुलती है तो पसीने पसीने होती है. खुद को संयत करने मे उन्हे थोडा समय लग जाता है पर फिर खुद पर हंसी आती आती है कि इस उम्र मे ऐसे सपने कैसे आ जाते है.
सपनो की ही दुनिया मे एक और पति पत्नी कुसुम और विनोद का जोडा मिला. जोकि दस साल से विवाहित हैं. सपने की बात सुन कर दोनो मुस्कुराने लगे. कुसुम ने बताया कि पिछ्ले दो चार बार से उनकी आखं खुलती है रात को पति के चिल्लाने की वजह से. वो सोते सोते हाय, हाय बचाओ, बोल रहे होते हैं. कई बार तो उन्होने ध्यान ही नही दिया क्योकि वो खुद भी नींद मे होती थी सुबह उठ कर जब इस बारे मे बात करते तब विनोद को याद भी नही रहता कि वो किस वजह से चिल्लाए थे. खैर, एक रात विनोद के चिल्लाते समय कुसुम की आखं खुल गई. उन्होने तुरंत अपने पति को उठाया पहले तो वो गहरी नींद मे थे पर कुछ पल बाद उन्होने नींद मे ही बताया कि वो एक सूनसान रास्ते मे जा रहे थे और अचानक कोई बुढिया आकर उनका बैग खिंचने लगी. इसलिए वो डर के मारे चिल्ला रहे हैं. बताते बताते वो फिर से सो गए. बात बता कर कुसुम हंसने लगी तो पति महोदय ने कहा कि अपनी बात भी तो बताओ जब एक बार तुम भी चीखी थी. इस पर कुसुम ने तुनक के कहा कि शायद वही बुढिया उनके सपने मे भी आ गई थी.
इससे पहले की उनकी नोक झोंक और आगे बढती. हमने ही आगे बढने मे अपनी भलाई समझी. सपनो की दुनिया मे आगे हमे मिली 10 साल की मणि. मणि ने बताया कि बहुत सपने आते है. सपने मे कभी वो स्टेज पर गाना गा रही होती है तो कभी क्लास मे फर्स्ट आती है तो कभी दोस्तो के साथ जंगल मे खेल रही होती है. पर एक सपना भुलाए नही भूलता वो है कि एक रात वो सो रही है. कमरे मे घना अंधेरा है. अचानक दो तीन चोर आ गए. उसकी आंख खुल गई और वो डर के मारे पलंग के नीचे छिप गई. चोर वही घूम रहे हैं. वो चिल्लाना चाह रही है पर उसकी आवाज ही नही निकल रही. वो पूरे जोर के साथ मम्मी, पापा…!! चोर आए हैं चिल्लाए जा रही है पर मानो वो गूंगी हो चुकी है. उफ!! और जब आखं खुली तो इतनी राहत मिली कि बस!! बहुत डरावना सपना था वो. यह सपना शायद जिंदगी भर नही भूलेगा.
सपनो की दुनिया मे और आगे बढे तो 20 वर्ष की नाव्या मिली. उनसे पूछा तो एकदम से खुश होकर बोली कि सपने मे वो मिस इंडिया चुनी गई और अमिताभ बच्चन जी ने उन्हे क्राउन पहनाया. इतना ही नही रणबीर कपूर के साथ उन्होने फिल्म भी साईन की. शूटिंग भी शुरु हो गई थी. सब कुछ इतना अच्छा चल रहा था सब लोग उसके काम की उसकी खूबसूरती की इतनी तारीफ कर रहे थे कि उसी समय अलार्म बजा और वो गहरी नींद से जाग गई. बताते बताते वो उदास हो गई.
उनको शुभकामनाए देते हुए हम आगे बढे तो सामने से 30 वर्ष की दर्शना चली आ रही थी. उन्होने बताया कि बचपन मे एक सपना बहुत आता था. उनके घर के ड्राईंग रुम मे शो केस मे बहुत बडी गुडिया थी. कई बार उन्हे रात को सपना आता अब पता नही कि वो सपना था या सच्चाई थी कि वो गुडिया शो केस से बाहर निकलती और पूरे घर का चक्कर लगाकर वापिस शो केस मे चली जाती. सुबह उठ कर जब वो उस शो केस वाली गुडिया को देखती तो उन्हे लगता कि वो उन्हे देखकर मुस्कुरा रही है. यह सब देख कर उन्हे बहुत डर लगता पर उन्होने अपनी मम्मी को यह बात कभी नही बताई कि कभी उनका मजाक की ना बन जाए. अरे बाप रे! उनका सपना या हकीकत जो भी थी सुनकर तो हम भी डर गए और वहां से खिसकने मे ही भलाई समझी.
Dreaming ….  45 वर्ष की सुनीता मिली. सुनीता ने जो बताया वो भी काफी हैरान कर देने वाला था. उन्होने बताया कि करीब 4-5 साल पहले की बाता है. रात को जब वो सो रही थे तो सपने मे उनके स्वर्गवासी पिता नजर आए. वो गेट के बाहर हाथ मे कोई तोहफा लिए खडे थे.सुनीता ने बताया कि उन्हे देख कर वो बाहर आई उनसे वो तोफहा लिया और गले मिल कर बहुत रोई. फिर अचानक आखं खुल गई. अगले दिन उन्हे खबर मिली कि जो जायदाद का जो काम इतने सालो से अटक रहा था. वो फैसला उनके हक मे रहा और वो जीत गए. बताते बताते सुनीता भावुक हो गई.

सपने की दुनिया मे ऐसे और भी बहुत लोगो से मिले और उन्होने बहुत बाते शेयर की.कोई कहता सुबह का सपना सच होता है तो कोई कहता कि किसी मरे हुए इंसान को देख लो तो उसकी उम्र बढती है.किसी ने बताया कि सपने मे मोटी गाय को देखो तो फायदा और पतली गाय को देखो तो नुकसान होता है. सपने मे कोई बडी इमारत देख लो तो भाग्य उदय होता है इत्यादि इत्यादि!!सच, सपनो की दुनिया ही निराली है.
वैसे इस बात मे भी कोई दो राय नही कि सपने में सपने जैसा कुछ लगता ही नही. बिलकुल ऐसा महसूस होता है जैसे यह सचमुच में घटित हो रहा है. कोई हमेशा हमेशा के लिए इसी दुनिया मे रहना चाह्ता है तो कोई इससे तुरंत बाहर निकलना चाह्ता है. दुनिया भर के अनेकों मनोवैज्ञानिको ने भी सपने की इस दुनिया में झाँकने की कोशिश की, लेकिन इस रहस्यमयी दुनिया को जितना भी समझने की कोशिश की उतनी ही यह उलझाती रही.
इसी बारे मे जब हमने जाने माने मनोचिकित्सक से बात की तो उन्होने बताया कि सपने आना एक सहज प्रक्रिया है. अब सपने किस तरह के आते हैं ये हमारे मन पर निर्भर करता है. असल मे, कोई ना कोई बात हमारे दिलो दिमाग मे कही दब कर बैठी होती है जिसका हमे पता भी नही चलता और देर सवेर कभी ना कभी हमे सपने के रुप मे दिखाई दे जाती है.
जाने माने मनोविश्लेषक सिग्मंड फ्रायड के अनुसार हम अपनी अतृप्त एवं अधूरी इच्छाओं की पूर्ति सपनो के माध्यम से करते है. कोई जो भी कहे पर सपनों का संसार वाकई मे अनूठा, अदभुत और आश्चर्यजनक है … :)


dreaming photo 5 Astro tips to overcome bad, horrible dreams-5

अक्सर हमें नींद में सपने आते हैं। कई बार ये सपने इतने डरावने होते हैं कि आंखें खुल जाती हैं और हम डर से पसीने-पसीने हो जाते हैं। इन सपनों में कई बार हम परेशान बच्चे, भटकती आत्माएं, जंगली जानवर, अंधेरे रास्ते या किसी खतरनाक संकट को देखते हैं जिससे हमें भयंकर डर लगने लगता है। ज्योतिष के कुछ साधारण से उपाय करके आप इन डरावने सपनों से बच सकते हैं।

प्रतिदिन रात को सोते समय हनुमान चालीसा का एक बार पाठ करके सोएं, आपको बुरे सपने आना बंद हो जाएंगे।

यदि रात में किसी भी तरह का डर लगता हो तो अपने सिरहाने के नीचे एक पीपल की जड़ तथा उसकी टहनी का छोटा सा टुकड़ा रखें। ये दोनों ही सूर्यास्त से पहले तोड़े, सूर्यास्त होने की स्थिति में अगले दिन ही पेड़ की जड़ और टहनी तोड़े।

कभी भी उत्तर तथा पश्चिम दिशा में सिर करके नहीं सोना चाहिए। ऎसा करने से शरीर के मैग्नेटिक करंट में बाधा पहुंचती है और दिमाग बैचेन हो जाता है। अक्सर इन दिशाओं में सिर करके सोने वाले चौंक कर उठ जाते हैं। पूर्व को सोने के लिए सबसे अच्छी दिशा माना जाता है। इस दिशा में सिर तथा पश्चिम में पैर करके सोने से अच्छी नींद आती है और बुरे सपनों से भी निजात मिलती है।

सपने में यदि बार-बार नदी, झरना या पानी दिखाई दे तो यह पितृ दोष की वजह से हो सकता है। इसके लिए अमावस्या के दिन सफेद चावल, शक्कर और घी मिला कर पीपल के पेड़ पर सूर्यास्त के बाद चढ़ाने से आराम मिलता है। See more…


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49. World’s Largest Lego© Brick Model Ship Comes to the Queen Mary

LONG BEACH, CA (June 18, 2015) — When Britain’s most famous ocean liner was still a dream, the Cunard Lines recruited the John Brown shipyard in Scotland to build what would become the world’s most famous ocean liner. When Britain’s certified LEGO builders, Bright Bricks Inc. decided to commemorate the ship in LEGO Bricks – they never dreamed the huge model would someday come to Long Beach and be displayed on the actual Queen Mary. “The agreement to display our model on the ship is the perfect end to a wonderful LEGO adventure,” said Bright Bricks co-founder, Ed Diment.


The LEGO company certifies only a few official model makers; Bright Bricks is located in England and is a well-established creative resource. “Companies from around the world hire us to interpret their products or brand using LEGO bricks. But, in this case, we decided to build the Queen Mary for our own satisfaction. It required four professional builders and over 250,000 individual LEGO bricks. It took almost four months to complete the project,” Diment added.

To better connect children and others with the historical persona of the Queen Mary, the decision was made to display the model in an exclusive space – The Shipyard – and to surround it with Bright Brick building stations where children and LEGO-enthusiasts can make their own version of the ship or anything else that comes to mind. The model room will feature 4 building tables and will be supervised by Queen Mary staff.

Over the past two years the Queen Mary has attracted close to 4 million visitors. With the world’s largest LEGO brick ship model’s arrival a new visitor category will become part of the Queen Mary’s ongoing success by adding a family and child-friendly element to an already robust historical narrative. Adults and children are likely to be overwhelmed by the sheer size and accuracy of the brick model.

The Bright Bricks (www.brightbricks.com) model of the Queen Mary begins its exhibition July 4, 2015. The Shipyard features historical photography of children at play while sailing as passengers; archival photos of the Queen Mary’s construction, antique tools and other items that capture the idea of building the world’s greatest passenger ship complete the decor.

“I can’t wait to see the look on the faces of the children who come to the exhibit and are confronted by this magnificent LEGO brick model. And for those tall enough; some children might notice a tiny top-hatted mini-figure of Sir Winston walking the upper deck,” said Queen Mary General Manager John Jenkins.

Length: 25’ 11”
Weight: 604 lbs.
Width: 3’ 1”
Height: 4’ 7”
LEGO Parts Used: Approximately 250,000
Number of Builder Hours: 600

About Bright Bricks
Bright Bricks is a professional LEGO building company based in Hampshire in the UK. It is home to Duncan Titmarsh, the UK’s only LEGO Certified Professional, and one of only 16 in the World, and his business partner Ed Diment who built the LEGO Queen Mary Model. Bright Bricks builds large commission models for clients all over the World as well as making custom LEGO sets, attending corporate events, making gifts and running children’s parties with LEGO bricks. Basically if it involves LEGO we do it!

About the Queen Mary
Located in the Port of Long Beach, the Queen Mary (www.queenmary.com) features a rich maritime history, authentic Art Deco decor, and stunning views of the Pacific Ocean and Long Beach city skyline. At the time of her maiden voyage in May of 1936, she was considered the grandest ocean liner ever built. The Queen Mary features award-winning restaurants, historical attractions, numerous special event salons and 346 staterooms.

Media Contact:
Johanna Felix
Freeman McCue Public Relations for The Queen Mary
j.felix@freemanmccue.com | 860-655-4221

Find the Queen Mary here:
Facebook: https://www.facebook.com/thequeen.mary
Twitter: https://twitter.com/TheQueenMary
YouTube: https://www.youtube.com/user/TheQueenMaryinLB

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50. Not a good idea


Not a good idea कुछ देर पहले कुछ स्कूली बच्चे घर के सामने से बाते करते हुए जा रहे थे. एक बोला अरे यार तूने मोदी को देखा. सफेद कुर्ता पजामा पहना हुआ था. दूसरा हंसता हुआ बोला ओ बेटे तू यकीन नही करेगा मेरे पापा, भाईयों बहनों इतना अच्छा बोलतें हैं कि मोदी भी शरमा जाए..

फिर एक अरविंद केजरीवाल का मजाक बनाते हुए कहना लगा कि हमारी तो औकात ही क्या है जी आम आदमी हैं ही हम तो … और फिर अपनी क्लास टीचर का मजाक उडाते वो तो आगे बढ गए पर मैं सोच रही थी कि हम किस तरह से मजाक बनाने लगें हैं. आदर मान देकर बोलना तो लगभग समाप्त ही हो चुका है.

Not a good ideaअब तो आखों की शर्म भी नही रही. ऐसे में, अगर घर के बडे ही बच्चों को आदर मान सीखाने की बजाय दूसरो का मजाक कैसे बनाना है यह सीखाएगें तो क्या होगा आप सोच भी नही सकते … बेशक इसमे टीवी चैनल की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका बन जाती है. हमारे घर के बच्चे आदर दे मान सम्मान से बात करेंगें तो निसन्देह बहुत अच्छा लगेगा.  अन्यथा कोई बडी बात नही कल को आप और हम भी  इसका शिकार बन गए तो तो..तो … तो …!!! :roll:


Not a good idea

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